सावलकोट जलविद्युत परियोजना को मंजूरी, फोटो- सोशल मीडिया 
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पहले सिंधु नदी और अब चिनाब, पानी के लिए तरसेगा पाकिस्तान! भारत ने सावलकोट परियोजना को दी मंजूरी

Sawalkot Project: पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर कड़ा रुख अपनाया है। मोदी सरकार ने चिनाब नदी पर लंबे समय से लंबित सावलकोट जलविद्युत परियोजना को हरी झंडी दे दी है।

प्रतीक पाण्डेय

Sawalkote Hydropower Project: सावलकोट जलविद्युत परियोजना को मोदी सरकार ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मंजूरी दे दी है। ऐसा कर भारत की ओर से पाकिस्तान को एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया गया कि भारत अब पानी को लेकर पुराने समझौतों और रियायतों को सीमित कर रहा है।

इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी देने की सिफारिश विशेषज्ञ पर्यावरण मूल्यांकन समिति (EAC) ने 26 सितंबर को की थी, जबकि अंतिम मंजूरी 9 अक्टूबर, 2025 को दी गई। अधिकारियों ने बताया कि संचयी प्रभाव और वहन क्षमता अध्ययन की आवश्यकता नहीं मानी गई, जो आम तौर पर नदी बेसिन में कई परियोजनाओं के संयुक्त प्रभाव का आकलन करने के लिए जरूरी होते हैं।

क्या है सावलकोट परियोजना

सावलकोट परियोजना चिनाब बेसिन में भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है। साल 1960 में हुई संधि के तहत पश्चिमी नदी के पानी के अपने हिस्से का पूरा उपयोग करने के सरकार की कोशिशों का एक खास हिस्सा है। सावलकोट परियोजना को 1856 मेगावाट की जलविद्युत क्षमता वाले स्टेशनों के रूप में डिजाइन किया गया है। परियोजना में 192.5 मीटर ऊंचा गुरुत्व बांध और 1,100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला जलाशय शामिल है। पूरा होने पर यह पश्चिमी नदियों पर स्थित सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक होगी।

सिंधु जल संधि के साथ और कहां है भारत का अधिकार

सावलकोट परियोजना को मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब भारत ने अप्रैल 2025 में सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित कर दिया। इस संधि के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियों रावी, व्यास और सतलुज के विशेष उपयोग के अधिकार हैं, जबकि तीन पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान के लिए निर्धारित हैं। भारत के पास इन नदियों का गैर-उपभोग्य उपयोग, जैसे रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत उत्पादन, नौवहन और मत्स्य पालन के सीमित अधिकार हैं।

काटे जाएंगे 2.22 लाख पेड़

सावलकोट परियोजना के तहत 847.17 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा और इसके लिए 2.22 लाख से अधिक पेड़ काटने पड़ेंगे, जिनमें से 1.26 लाख पेड़ सिर्फ रामबन जिले में हैं। परियोजना दो चरणों में बन रही है, जिससे क्रमशः 1,406 मेगावाट और 450 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा।

स्थानीय और पर्यावरणीय प्रभाव

जम्मू-कश्मीर के पर्यावरणविदों ने परियोजना के पारिस्थितिक प्रभाव पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विशाल जलाशय नदी के प्राकृतिक प्रवाह और तलछट परिवहन को प्रभावित कर सकता है, जिससे नदी के चैनल और आसपास की कृषि भूमि अस्थिर हो सकती है। इसके अलावा, बांध के निर्माण से कई समुदायों की आजीविकाएं प्रभावित होंगी।

NHPC ने कहा है कि 2022–2023 के दौरान जुटाए गए नए पर्यावरणीय आंकड़े परियोजना की प्रभावशीलता और सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। केंद्र सरकार का दावा है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा रणनीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। इस परियोजना के साथ भारत ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि पानी को लेकर पुरानी रियायतों का दौर खत्म हो चुका है, और भारत अब पश्चिमी नदियों में अपनी जलविद्युत क्षमता का सक्रिय उपयोग करेगा।

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