दिव्यांगता कानूनी लड़ाई लड़ने का अधिकार नहीं छीनती।
मूक-बधिर महिला को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा।
पति को 'नेक्स्ट फ्रेंड' नहीं बना सकतीं मूक-बधिर महिला।
मानसिक अक्षमता के बिना नेक्स्ट फ्रेंड मिलना मुमकिन नहीं।
12 लाख की जमीन का विवाद और हाईकोर्ट का फैसला।
Jagdalpur Land Dispute Legal Rights Of Disabled : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि शारीरिक अक्षमता केस लड़ने से नहीं रोकती। सुनने और बोलने में असमर्थ होना कोई कानूनी अयोग्यता नहीं है।
न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने जगदलपुर की महिला की याचिका पूरी तरह खारिज कर दी।
यह पूरा मामला 1.21 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा हुआ है। यह जमीन जगदलपुर की अबेदा बानो के नाम पर है। दंतेवाड़ा के राजेश और सुनीता सुराना ने इस पर दावा किया।
खरीदारों का कहना था कि 2010 में इकरारनामा हुआ था। जमीन की कुल कीमत 12.08 लाख रुपये तय की गई थी। इसके लिए पांच लाख रुपये एडवांस भी दिए गए थे।
खरीदारों का आरोप था कि बाकी रकम देने पर भी रजिस्ट्री नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अनुबंध के पालन के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
दूसरी तरफ अबेदा बानो और उनके पति ने अलग केस किया। उन्होंने 2010 के इकरारनामे को शून्य घोषित करने की मांग की। इसी बीच महिला ने अपने पति को 'नेक्स्ट फ्रेंड' बनाने का आवेदन दिया।
महिला का कहना था कि वह जन्म से मूक-बधिर हैं। इस वजह से वह अदालत में अपना पक्ष नहीं रख सकती हैं। इसलिए पति को उनका विधिक प्रतिनिधि माना जाए।
हाईकोर्ट ने मामले के सारे रिकॉर्ड का ध्यान से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि महिला काफी शिक्षित हैं। वह पहले भी संपत्ति के कई वित्तीय लेन-देन कर चुकी हैं।
महिला के पास पैन कार्ड भी उपलब्ध है। वह शुरुआत से वकील के माध्यम से ही अपना केस लड़ रही हैं।
अदालत ने कहा कि मानसिक अस्वस्थता का कोई प्रमाण नहीं मिला। महिला मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और सक्षम हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बोलने में असमर्थ व्यक्ति भी केस लड़ सकता है। वह लिखकर या संकेतों के माध्यम से अपनी बात कह सकता है।
जरूरत पड़ने पर दुभाषिए या विशेष शिक्षक की मदद ली जा सकती है। महिला अपने वकील को लिखकर या इशारों से निर्देश दे सकती हैं।
सीपीसी के आदेश 32 नियम 15 में यह प्रावधान है। इसके तहत केवल मानसिक अक्षमता पर ही 'नेक्स्ट फ्रेंड' नियुक्त होता है।
पति बातचीत में मदद कर सकते हैं। हालांकि, इससे उन्हें स्वतः 'नेक्स्ट फ्रेंड' बनने का अधिकार नहीं मिलता। कोर्ट ने 4 अगस्त 2022 के निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया।