Highlights:
भारत के कई निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की पूरी फीस 60 लाख से 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक हो सकती है।
रूस, चीन और वियतनाम में कुछ विश्वविद्यालय अपेक्षाकृत कम खर्च में मेडिकल की पढ़ाई का विकल्प देते हैं।
विदेश में दाखिला लेने से पहले विश्वविद्यालय की मान्यता और भारत में प्रैक्टिस करने के नियम जांचना जरूरी है।
India Mein MBBS Ki Fees Kitni Hai: भारत में हर साल लाखों छात्र डॉक्टर बनने के लिए NEET-UG की परीक्षा देते हैं। परीक्षा पास करने के बाद भी कई छात्रों के लिए MBBS में दाखिला लेना आसान नहीं होता। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें सीमित हैं, जबकि निजी कॉलेजों की फीस इतनी ज्यादा है कि आम परिवारों के लिए पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है।
कई निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की पूरी पढ़ाई का खर्च 60 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये या उससे भी ज्यादा हो सकता है। इसी वजह से बड़ी संख्या में भारतीय छात्र रूस, चीन, यूक्रेन, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों में मेडिकल की पढ़ाई करने जाते हैं। सवाल यह है कि भारत में MBBS की पढ़ाई इतनी महंगी क्यों है और दूसरे देशों में कम खर्च में मेडिकल डिग्री कैसे मिल जाती है?
1. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें सीमित
भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए हर साल बड़ी संख्या में छात्र NEET-UG की परीक्षा देते हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फीस कम होने के कारण यहां दाखिला पाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है। सभी योग्य छात्रों को सरकारी कॉलेज में सीट नहीं मिल पाती। ऐसे में कई छात्र निजी मेडिकल कॉलेजों का विकल्प चुनते हैं, जहां फीस काफी ज्यादा होती है।
2. निजी मेडिकल कॉलेजों को चलाने का खर्च
मेडिकल कॉलेज खोलने और चलाने के लिए बड़े अस्पताल, आधुनिक लैब, चिकित्सा उपकरण और मरीजों के इलाज की सुविधाएं जरूरी होती हैं। इसके अलावा कॉलेजों को हॉस्टल, लाइब्रेरी और दूसरी शैक्षणिक सुविधाओं पर भी खर्च करना पड़ता है। इन व्यवस्थाओं को बनाए रखने की लागत का असर छात्रों की फीस पर पड़ता है।
3. डॉक्टरों और शिक्षकों की नियुक्ति
MBBS की पढ़ाई के लिए अनुभवी डॉक्टरों, सर्जन और विशेषज्ञ शिक्षकों की जरूरत होती है। इसके साथ ही लैब टेक्नीशियन, नर्सिंग स्टाफ और अस्पताल के दूसरे कर्मचारियों की नियुक्ति भी करनी पड़ती है। इन सभी पर होने वाला खर्च मेडिकल कॉलेजों की कुल लागत बढ़ाता है।
4. सरकारी और निजी कॉलेजों की फीस में बड़ा अंतर
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की फीस आमतौर पर कम होती है। उदाहरण के तौर पर, एम्स जैसे संस्थानों में शैक्षणिक फीस काफी कम रखी जाती है।
इसके उलट, निजी कॉलेजों में फीस कई लाख रुपये सालाना तक पहुंच सकती है। हालांकि, फीस कॉलेज, राज्य और सीट की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग होती है। हॉस्टल, भोजन और अन्य खर्च जोड़ने पर कुल लागत और बढ़ जाती है।
5. मैनेजमेंट और NRI कोटे की सीटें
कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों में मैनेजमेंट और NRI कोटे के तहत भी दाखिला दिया जाता है। इन सीटों की फीस सामान्य सरकारी सीटों की तुलना में काफी ज्यादा हो सकती है। कुछ संस्थानों में पूरी पढ़ाई का खर्च करोड़ रुपये के आसपास या उससे अधिक पहुंच सकता है।
इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों के लिए मेडिकल की पढ़ाई और मुश्किल हो जाती है। डॉक्टरों और शिक्षकों की नियुक्ति MBBS की पढ़ाई के लिए अनुभवी डॉक्टरों, सर्जन और विशेषज्ञ शिक्षकों की जरूरत होती है। इसके साथ ही लैब टेक्नीशियन, नर्सिंग स्टाफ और अस्पताल के दूसरे कर्मचारियों की नियुक्ति भी करनी पड़ती है। इन सभी पर होने वाला खर्च मेडिकल कॉलेजों की कुल लागत बढ़ाता है।
रूस में MBBS की पूरी पढ़ाई का खर्च लगभग 22 से 30 लाख रुपये बताया जाता है। वहीं, चीन में भी कई मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का कुल खर्च करीब 25 से 30 लाख रुपये तक हो सकता है। हालांकि, फीस विश्वविद्यालय, कोर्स और रहने के खर्च के हिसाब से अलग-अलग होती है।
अगर हम बात करें वियतनाम में मेडिकल की शिक्षा की तो यहां कुछ मेडिकल संस्थानों में विदेशी छात्रों की सालाना फीस करीब 4 लाख रुपये बताई गई है। इसी तरह दूसरे देशों में भी भारतीय छात्रों को अपेक्षाकृत कम खर्च में मेडिकल की पढ़ाई के विकल्प मिलते हैं।
मेडिकल शिक्षा की ऊंची फीस और सरकारी कॉलेजों में सीमित सीटों के कारण हर साल हजारों भारतीय छात्र विदेश का रुख करते हैं। हालांकि, विदेश से MBBS करना हमेशा आसान नहीं होता। छात्रों को भाषा, रहने और पढ़ाई के माहौल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत लौटने के बाद भी विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स को लागू नियमों के अनुसार जरूरी परीक्षा पास करनी होती है और निर्धारित इंटर्नशिप पूरी करनी पड़ सकती है। इसलिए दाखिला लेने से पहले विश्वविद्यालय की मान्यता, पढ़ाई की भाषा और भारत में प्रैक्टिस करने की शर्तें जांचना जरूरी है।
मेडिकल शिक्षा को आम छात्रों की पहुंच में लाने के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या बढ़ाना, फीस में पारदर्शिता रखना और निजी संस्थानों की फीस पर प्रभावी निगरानी जरूरी मानी जाती है। इससे छात्रों को देश में ही कम खर्च में डॉक्टर बनने का अवसर मिल सकता है।
मेडिकल शिक्षा का खर्च कम होना सिर्फ छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे ज्यादा युवाओं को मेडिकल क्षेत्र में आने का मौका मिल सकता है और भविष्य में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।