NMC Rules For Foreign Medical Graduates: विदेश से MBBS या मेडिकल की पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों के लिए डिग्री के साथ-साथ वहां मिलने वाले प्रैक्टिस लाइसेंस की स्थिति भी अहम है। भारत में डॉक्टर के रूप में रजिस्ट्रेशन पाने के लिए लागू नियमों के तहत विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स को निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी करनी होती हैं।
इसी संबंध में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने स्पष्ट किया है कि उम्मीदवार के पास उस देश में मेडिकल प्रैक्टिस करने का ऐसा अधिकार होना चाहिए, जो वहां के मेडिकल ग्रेजुएट्स को स्वतंत्र रूप से इलाज करने के लिए मिलता है। केवल छह साल का मेडिकल कोर्स पूरा कर लेना या डिग्री के बाद जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति मिलना अपने आप में इस शर्त को पूरा करने के बराबर नहीं माना जा सकता। जॉर्जिया से मेडिकल शिक्षा लेने वाले छात्रों के मामले में यह अंतर खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करने वाले भारतीय नागरिकों को भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए लागू नियम के शर्तें को पूरी करनी होती हैं। FMGE यानी फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन इस प्रक्रिया से जुड़ी परीक्षा रही है।
ऐसे में विदेशी डिग्री की मान्यता के साथ यह भी देखा जाता है कि उम्मीदवार ने जिस देश से पढ़ाई की है, वहां मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए उसे किस तरह का अधिकार प्राप्त है। NMC के स्पष्टीकरण का मुख्य बिंदु यही है कि मेडिकल डिग्री और स्वतंत्र रूप से डॉक्टर के तौर पर काम करने का लाइसेंस दो अलग-अलग बातें हो सकती हैं। इसलिए विदेश में पढ़ाई करने की योजना बना रहे छात्रों को संबंधित देश के लाइसेंसिंग नियमों को भी समझना चाहिए।
NMC के मुताबिक, जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति तभी पात्रता की शर्त के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है, जब संबंधित देश के कानून के तहत उम्मीदवार को आवश्यक स्तर पर मेडिकल प्रैक्टिस करने का अधिकार भी प्राप्त हो।
यदि किसी देश में स्वतंत्र रूप से डॉक्टर के तौर पर काम करने के लिए मेडिकल डिग्री के बाद अतिरिक्त परीक्षा, पोस्टग्रेजुएट पढ़ाई या रेजिडेंसी पूरी करना जरूरी है, तो केवल जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति को स्वतंत्र मेडिकल लाइसेंस के समान नहीं माना जा सकता। इसीलिए उम्मीदवारों के लिए यह जानना जरूरी है कि उनकी डिग्री उन्हें वास्तव में किस स्तर तक प्रैक्टिस करने का अधिकार देती है।
यह मामला जॉर्जिया में छह वर्षीय मेडिकल कोर्स पूरा करने वाले छात्रों की पात्रता से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वहां मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद मिलने वाली डिग्री को MD कहा जाता है। हालांकि, डिग्री मिलने के बाद जूनियर डॉक्टर के रूप में काम करने की अनुमति और स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज करने का अधिकार एक समान नहीं हैं।
विवाद इसी अंतर को लेकर है। यदि किसी छात्र को मेडिकल कोर्स पूरा करने के बाद केवल निगरानी में काम करने की अनुमति मिलती है, जबकि स्वतंत्र प्रैक्टिस के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है, तो FMGE की पात्रता के लिए संबंधित नियमों की शर्तें महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
NMC के नियम 4(B) के अनुसार, विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र के पास उस देश में डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने के लिए जरूरी रजिस्ट्रेशन या लाइसेंस होना चाहिए।
उसे वहां के मेडिकल ग्रेजुएट्स की तरह स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज करने का अधिकार भी मिलना चाहिए। यानी केवल मेडिकल डिग्री हासिल कर लेना काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि छात्र संबंधित देश के नियमों के अनुसार स्वतंत्र रूप से डॉक्टर के तौर पर काम करने के योग्य हो।
जॉर्जिया में छह साल का मेडिकल कोर्स पूरा करने के बाद छात्र जूनियर डॉक्टर के रूप में काम कर सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की निगरानी में ही काम करने की अनुमति मिलती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज भी कर सकते हैं।
इसके लिए वहां के नियमों के अनुसार अतिरिक्त परीक्षा पास करना, आगे की पढ़ाई करना या रेजिडेंसी पूरी करना जरूरी हो सकता है। ऐसे में केवल जूनियर डॉक्टर के तौर पर काम करने की अनुमति मिलने से NMC की पात्रता संबंधी शर्त पूरी होती है या नहीं, यह संबंधित नियमों के आधार पर तय होगा।
विदेश में मेडिकल कॉलेज चुनते समय छात्रों को सिर्फ कोर्स की अवधि या डिग्री के नाम पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उन्हें यह भी पता करना चाहिए कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उस देश में डॉक्टर के रूप में काम करने के लिए कौन-सा लाइसेंस मिलता है।
यह जांचना जरूरी है कि वे सीधे मरीजों का इलाज कर सकते हैं या इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त परीक्षा, पोस्टग्रेजुएट पढ़ाई या रेजिडेंसी पूरी करनी होगी। दाखिला लेने से पहले संबंधित देश के नियमों और भारत में लागू NMC की शर्तों की जानकारी जरूर हासिल करें।