सरकार का दबाव, कॉलेजियम में मतभेद और जजों की नियुक्ति…जस्टिस कौल की किताब में चंद्रचूड़ को लेकर क्या दावा?

Without Fear of Favour Book: पूर्व जज संजय किशन कौल के संस्मरण में दावा किया गया है कि CJI डीवाई चंद्रचूड़ न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार के प्रति नरम थे।
Justice Sanjay Kishan Kaul on dy chandrachud
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, पूर्व जज संजय किशन कौलSource- Social Media
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Highlights

  • जस्टिस संजय किशन कौल के अप्रकाशित संस्मरण में कॉलेजियम की कार्यप्रणाली को लेकर कई दावे किए गए हैं।

  • कौल ने आरोप लगाया कि एक नियुक्ति पर चंद्रचूड़ सरकार की राय जानने के लिए फोन करने पर विचार कर रहे थे।

  • चंद्रचूड़ ने कहा कि किताब पढ़े बिना वह दावों पर टिप्पणी नहीं कर सकते; उन्होंने कौल के साथ संबंधों को सम्मानजनक बताया।

DY Chandrachud Collegium controversy: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल के अप्रकाशित संस्मरण में यह दावा किया गया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कौल ने अपनी किताब में कॉलेजियम की कार्यप्रणाली, न्यायाधीशों की नियुक्ति और सरकार के कथित हस्तक्षेप से जुड़े कई प्रसंगों का जिक्र किया है।

जस्टिस कौल दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी किताब Without Fear of Favour इसी महीने के अंत में जगरनॉट प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली है। द इंडियन एक्सप्रेस ने किताब की अप्रकाशित पांडुलिपि की समीक्षा की है।

सरकार की राय जानने के लिए फोन करना चाहते थे चंद्रचूड़: कौल

जस्टिस कौल ने लिखा कि जून 2022 में कॉलेजियम का हिस्सा बनने के बाद उन्होंने न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को सुझाव दिया था कि दोनों को सरकार के साथ मिलकर और एकजुट होकर पेश आना चाहिए। कौल के मुताबिक, उन्होंने यह भी कहा था कि चूंकि वह मुख्य न्यायाधीश नहीं थे, इसलिए सरकार के सामने अधिक दृढ़ रुख अपना सकते थे।

हालांकि, कौल का दावा है कि कुछ अपवादों को छोड़कर चंद्रचूड़ सरकार के साथ संबंधों को अपने स्तर पर ही संभालना पसंद करते थे।

कौल ने कॉलेजियम की उस पहली बड़ी प्रक्रिया का भी जिक्र किया, जिसमें छह रिक्त पदों के लिए नामों पर विचार किया जाना था। उनके अनुसार, पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। लेकिन बैठक के रास्ते में चंद्रचूड़ ने छठे नाम का प्रस्ताव रखा।

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कौल ने लिखा कि अन्य न्यायाधीशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। उन्हें संदेह हुआ कि यह नाम सरकार के कहने पर प्रस्तावित किया गया था। उनके मुताबिक, इसके बाद चंद्रचूड़ ने उन्हें अलग ले जाकर पूछा कि क्या उन्हें सरकार की राय जानने के लिए फोन करना चाहिए।

कौल ने लिखा कि उन्होंने चंद्रचूड़ को ऐसा करने से रोका। उनका कहना था कि कॉलेजियम की बैठक के बीच सरकार की राय लेने के लिए फोन करना उचित नहीं होगा। अंततः पांच नामों को मंजूरी मिली, जबकि छठे नाम पर सहमति नहीं बनी।

अल्पसंख्यक समुदाय के न्यायाधीश के नाम पर भी विवाद का दावा

कौल ने अपने संस्मरण में एक अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर हुए मतभेद का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक, उम्मीदवार अल्पसंख्यक धर्म से संबंधित था और इस नियुक्ति पर सरकार की ओर से सवाल उठाए गए थे।

कौल के अनुसार, सरकार ने पूछा था कि क्या अल्पसंख्यक समुदायों को और प्रतिनिधित्व देने की जरूरत है, जबकि अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के न्यायाधीश पहले से ही न्यायपालिका में मौजूद थे। इसके बाद उम्मीदवार के परिवार की जाति के बारे में भी सवाल किया गया।

कौल ने लिखा कि वह इस तर्क से परेशान थे। उनके मुताबिक, उन्होंने चंद्रचूड़ से कहा कि यदि नियुक्तियों के फैसले इसी तरह लिए जाने हैं, तो मुख्य न्यायाधीश खुद ही नामों पर विचार कर नियुक्तियां कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे फैसले का हिस्सा नहीं बन सकते।

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'कॉलेजियम राजनीतिक दबाव से पूरी तरह अलग नहीं'

जस्टिस कौल ने किताब में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यह मानना गलत होगा कि कॉलेजियम राजनीतिक दबावों से पूरी तरह अलग रहकर काम करता है।

उन्होंने लिखा कि सरकारें नियुक्ति प्रक्रिया में अपना प्रभाव डालने की कोशिश करती हैं और मौका मिलने पर हस्तक्षेप कर सकती हैं। उनके मुताबिक, चुनौती इन दबावों के बीच संस्थागत निष्पक्षता और अखंडता बनाए रखने की है।

कौल ने यह भी लिखा कि ऐसे मामलों में सरकार उन न्यायाधीशों का अधिक सम्मान करती है, जो अपने रुख पर दृढ़ रहते हैं और संतुलन बनाए रखते हैं।

डीवाई चंद्रचूड़ ने क्या जवाब दिया?

जस्टिस संजय किशन कौल के दावों पर द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किताब पढ़े बिना वह इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।

हालांकि, उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में कॉलेजियम की बैठकें अच्छी रही थीं। कौल के साथ अपने संबंधों को लेकर उन्होंने कहा कि दोनों के बीच सम्मानजनक रिश्ता रहा और बैठकों में अच्छी बातचीत, तर्कपूर्ण संवाद तथा सौहार्दपूर्ण माहौल रहा।

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