Ratan Tata Career Journey: एक आम आदमी के लिए सस्ती कार का सपना हो या देश की सबसे पुरानी एयरलाइन को वापस अपने समूह में लाने का फैसला, रतन टाटा ने कई बार साबित किया कि कारोबार सिर्फ मुनाफा कमाने का नाम नहीं है। उनकी सोच में नए प्रयोग, देश के लिए कुछ बड़ा करने का जुनून और आम लोगों की जरूरतों की समझ शामिल थी।
टाटा नैनो, टीसीएस और एयर इंडिया जैसे फैसले उनके इसी नजरिए की झलक दिखाते हैं। लेकिन जिस शख्स ने कारोबार की दुनिया में इतनी बड़ी पहचान बनाई, उसकी अपनी पढ़ाई कहां हुई थी? रतन टाटा ने कौन-सी डिग्री हासिल की और पढ़ाई पूरी करने के बाद टाटा समूह में उनका सफर कैसे शुरू हुआ? 9 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर आइए जानते हैं रतन टाटा की शिक्षा, शुरुआती करियर और उन बड़े फैसलों की कहानी, जिन्होंने न सिर्फ टाटा समूह को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय उद्योग जगत पर भी अपनी छाप छोड़ी।
रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई मुंबई में हुई। उन्होंने कैंपियन स्कूल और कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से शिक्षा हासिल की। हालांकि, कुछ प्रकाशित जीवनियों में शिमला के बिशप कॉटन स्कूल का भी जिक्र मिलता है, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स की आधिकारिक जीवनी में उनकी शुरुआती पढ़ाई के लिए कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल का नाम दर्ज है।
रतन टाटा का बचपन आसान नहीं था। जब वह करीब 10 साल के थे, तब उनके माता-पिता अलग हो गए। इसके बाद उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने उन्हें और उनके छोटे भाई जिमी को पाला। दादी ने दोनों भाइयों को अच्छे संस्कार दिए और मुश्किल हालात में भी मजबूती से आगे बढ़ना सिखाया। माना जाता है कि बचपन में मिली इन्हीं सीखों ने आगे चलकर रतन टाटा के व्यक्तित्व और सोच को आकार देने में अहम भूमिका निभाई।
रतन टाटा का सपना सिर्फ भारत में कारोबार बढ़ाने तक सीमित नहीं था। वह चाहते थे कि टाटा समूह की पहचान दुनिया की बड़ी कंपनियों के बीच भी बने। इसी सोच के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के अधिग्रहण की रणनीति अपनाई।
साल 2000 में टाटा टी ने ब्रिटेन की मशहूर चाय कंपनी टेटली को खरीदा। इसके बाद 2007 में टाटा स्टील ने यूरोप की बड़ी स्टील कंपनी कोरस का अधिग्रहण किया। फिर 2008 में टाटा मोटर्स ने फोर्ड से जगुआर और लैंड रोवर ब्रांड खरीद लिए। इन सौदों ने दिखाया कि भारतीय कंपनियां भी दुनिया के बड़े कारोबार में अपनी मजबूत जगह बना सकती हैं।
रतन टाटा चाहते थे कि आम भारतीय परिवार भी अपनी कार खरीदने का सपना पूरा कर सके। बताया जाता है कि एक बार उन्होंने एक परिवार को स्कूटर पर बारिश में सफर करते देखा। इस घटना ने उन्हें ऐसी सस्ती कार बनाने के लिए प्रेरित किया, जिसमें पूरा परिवार सुरक्षित सफर कर सके।
इसी सोच के साथ साल 2008 में टाटा नैनो पेश की गई। इसकी शुरुआती कीमत करीब एक लाख रुपये रखी गई थी, इसलिए इसे 'लखटकिया कार' कहा जाने लगा। हालांकि, बाजार में नैनो को वैसी कामयाबी नहीं मिली, जैसी उम्मीद की गई थी। इसके बावजूद इस कार ने दिखाया कि रतन टाटा आम लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बड़े फैसले लेने में विश्वास रखते थे।
टाटा समूह को सिर्फ स्टील और ऑटोमोबाइल तक सीमित न रखकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ाना भी रतन टाटा की रणनीति का अहम हिस्सा था। उनके नेतृत्व में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने तेजी से तरक्की की और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान मजबूत की।
साल 2003 में TCS ने एक अरब डॉलर से ज्यादा का सालाना राजस्व दर्ज किया। इसके बाद कंपनी ने दुनिया भर में अपना कारोबार फैलाया। आज TCS भारतीय आईटी सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में शामिल है और बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने के साथ देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देती है।
एयर इंडिया का टाटा समूह में वापस आना रतन टाटा के सबसे चर्चित फैसलों में से एक था। इस एयरलाइन की शुरुआत जेआरडी टाटा ने की थी, लेकिन बाद में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और यह सरकारी नियंत्रण में चली गई।
साल 2021 में एयर इंडिया के अधिग्रहण के लिए टाटा समूह की बोली सफल हुई और जनवरी 2022 में एयरलाइन औपचारिक रूप से समूह के पास लौट आई। इस सौदे से टाटा समूह ने विमानन क्षेत्र में अपनी पुरानी विरासत को फिर से हासिल किया। यह फैसला रतन टाटा के लिए भावनात्मक महत्व भी रखता था, क्योंकि एयर इंडिया का टाटा परिवार से पुराना रिश्ता रहा है।
रतन टाटा की पहचान सिर्फ एक सफल उद्योगपति के तौर पर नहीं रही। उन्होंने ऐसे फैसले लिए, जिनसे भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी क्षमता दिखाने का मौका मिला। टेटली, कोरस और जगुआर लैंड रोवर जैसे अधिग्रहणों से लेकर टाटा नैनो और एयर इंडिया तक, उनके फैसलों के पीछे कारोबार के साथ एक बड़ा नजरिया भी दिखाई देता है।
उनकी कारोबारी सोच ने भारतीय उद्योग जगत को यह भरोसा दिया कि देश की कंपनियां भी वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। यही वजह है कि रतन टाटा की विरासत को सिर्फ कंपनियों की तरक्की से नहीं, बल्कि उनकी दूरदर्शिता, सादगी और आम लोगों के प्रति संवेदनशीलता से भी याद किया जाता है।