

Ratan Tata And N Chandrasekaran Relation: टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट के बीच पिछले छह महीने से जारी टकराब का अब अंत हो गया है। दरअसल, टाटा सन्स के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने ऐलान कर दिया है कि फरवरी 2027 में कार्यकाल खत्म होने के बाद वह अपने बद को छोड़ देंगे। उनके द्वारा की गई इस घोषणा के बाद अब नए चेयरमैन की नियुक्ति आसान हो जाएगी। चंद्रशेखरन रतन टाटा के काफी नजदीकी थे।
9 अक्टूबर, 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ग्रुप ने कई बदलाव देखें हैं। इस में टाटा ट्रस्ट के नए चैयरमैन नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच अच्छे संबंध नहीं रहें। कई मुद्दों पर दोनों अलग-थलग नजर आए। यही वह कारण है, जिसने आखिरकार में चंद्रशेखरन को अलग राह चुनने के लिए मजबूर कर दिया।
एन चंद्रशेखरन को टाटा सन्स का चेयरमैन नियुक्त करना रतन टाटा के सबसे बड़े फैसलों में से एक माना जाता है। जब साल 2017 में चंद्रशेखरन को टाटा सन्स का कमान सौंपा गया, तब टाटा ग्रुप के इतिहास में एक सबसे बड़ी परंपरा टूट गई। टाटा ग्रुप की शुरुआत सन 1868 में जमशेदजी टाटा ने की थी। इसके बाद लंबे समय तक ग्रुप के टॉप पोजिशन पर टाटा फैमिली या पारसी कम्युनिटी से आने वाले लोगों का वर्चस्व रहा। चंद्रशेखरन टाटा ग्रुप की इस परंपरा से काफा अलग थे। वह न तो टाटा परिवार के सदस्य थे और न ही पारसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे। बावजूद इसके रतन टाटा ने उन्हें इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए चुना।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी चंद्रशेखरन कीप्रोफेशनल कैपेसिटी और उनपर उनका अटूट भरोसा। चंद्रशेखरन को जब यह जिम्मेदारी मिली उस वक्त टाटा ग्रुप बुरे दौर से गुजर रहा थ । साल 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा सन्स के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद ग्रुप के अंदर विवाद बढ़ गया था। ममला कोर्ट तक पहुंच गया था, जिसके बाद से ट्र्सट के प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठने लगे थे।
साइरस मिस्त्री के ग्रुप से अलग होने के बाद रतन टाटा को एक ऐसे शख्स की तलाश थी, जो समूह को इस बुरे वक्त में भी मजबूती से संभाल सके। हालांकि, चंद्रशेखरन के नाम के साथ ही रतन टाटा की तलाश खत्म हुई। उस वक्त वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के प्रमुख के तौर पर अपनी सेवा दे रहे थे। उनके नेतृत्व में टीसीएस लगातार ग्रोथ कर रही थी। रतन टाटा ने भरोसा करते हुए चंद्रशेखरन को टाटा सन्स की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि रतन टाटा और चंद्रशेखरन का रिश्ता सिर्फ चेयरमैन और अधीनस्थ का नहीं था। चंद्रशेखरन कई मौकों पर रतन टाटा से सुझाव लेते थे और रतन टाटा भी उनके बिजनेस करने के तरीके और समझ पर भरोसा करते थे। चंद्रशेखरन के लीडरशिप में टाटा ग्रुप ने कई अहम फैसले लिए। ग्रुप के अलग-अलग बिजनेस को मजबूत करने के लिए रिस्ट्रक्चर किया गया। कंपनियों के विलय और कारोबार को सरल बनाने पर जोर दिया गया।
कभी टाटा ग्रुप का हिस्सा रही एअर इंडिया की शुरुआत जमशेदजी टाटा ने 1932 में की थी। हालांकि, बाद में यह सरकार के कंट्रोल में चली गई। जब सरकार ने एअर इंडिया को बेचने की प्रक्रिया शुरू की तो टाटा ग्रुप ने इसे वापस हासिल करने के लिए बोली लगाई। साल 2022 में एअर इंडिया फिर से टाटा ग्रुप में शामिल हो गई। इस डील को पूरा करने और टाटा ग्रुप के पक्ष में बाजी पलटने में चंद्रशेखरन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रतन टाटा के लिए यह सिर्फ एक बिजनेस डील नहीं था। भावनात्मक रूप से भी यह डील उनके लिए काफी अहम था। इस तरह चंद्रशेखर ने रतन टाटा के इस सपने को पूरा किया।
रतन टाटा को कुत्तों से बेहद लगाव था। खासकर आवारा कुत्तों को लेकर वह काफी दयालु थे। जब साल 2017 में चंद्रशेखर ने मुंबई स्थिति टाटा ग्रुप के ऐतिहासिक हेडक्वार्टर बॉम्बे हाउस के रिनोवेशन का काम शुरू कराया तो रतन टाटा ने चिंता जताई। उन्होंने पूछा कि वहां रह रहने वाला आवारा कुत्तों का क्या होगा? चंद्रशेखरन ने रतन टाटा की इस चिंता को गंभीरता से लेते हुए बॉम्बे हाउस के रिनोवेशन में कुत्तों के लिए एक विशेष जगह का निर्माण करवाया। जहां उनके रहने और देखभाल की सुविधा शुरू की गई। रतन टाटा जब बॉम्बे हाउस का दौरा करने पहुंचे तो इस व्यवस्था को देखकर वे बेहद खुश हुए। यह घटना दोनों के रिश्तों को समझने के लिए काफी है।
चंद्रशेखरन के कारोबारी समझ और काम करने के तरीके से रतन टाटा बेहद प्रभावित थे। साल 2022 में उनके कार्यकाल को अगले 5 साल तक के लिए बढ़ाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई। फरवरी 2022 में टाटा सन्स के बोर्ड मीटिंग में रतन टाटा को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। उन्होंने चंद्रशेखरन के कार्यकाल को अगले 5 साल तक बढ़ाने का समर्थन किया। बोर्ड ने भी इस पर सहमति जताई। यानी रतन टाटा के लिए चंद्रशेखर सिर्फ एक नियुक्त किए गए चेयरमैन नहीं थे। वह उनके भरोसेमंद व्यक्ति बन चुके थे। लेकिन 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ग्रुप के शीर्ष स्तर पर समीकरण बदलने लगे।
9 अक्टूबर 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन के तौर पर नियुक्त किया गया। टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट के बीच संबंधों में अब नया नेतृत्व सामने था। बीते छह महीने के भीतर ही दोनों के बीच कई अहम मुद्दों पर मतभेद देखने को मिले। चंद्रशेखरन के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का मामला भी इसी वजह से लटका रहा।
बता दें कि चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म हो होने वाला है। उनके कार्यकाल को विस्तार करने की चर्चा शुरू हुई तो टाटा ट्रस्ट की ओर से कुछ शर्तों को लेकर सवाल उठने लगे। इनमें टाटा सन्स के भविष्य की कारोबारी रणनीति, बोर्ड में प्रतिनिधित्व और कंपनी की लिस्टिंग जैसे मुद्दे बताए गए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नोएल टाटा चाहते थे कि टाटा सन्स का भविष्य शेयर मार्केट में लिस्टिंग होने के लेकर स्पष्ट प्रतिबद्धता हो।
इसके अलावा बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर भी मतभेद थे। चंद्रशेखरन इन शर्तों पर पूरी तरह से सहमत नहीं हुए। नतीजा यह हुआ कि फरवरी 2026 में शुरु हुआ गतिरोध कई महीनों तक बन रहा। हालांकि, आज बुधवार, 12 अगस्त को चंद्रशेखर ने खुद ही घोषणा कर दिया है कि वह अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा चेयरमैन के पद पर काम नहीं करेंगे।
चंद्रशेखरन का टाटा ग्रुप से अलग होना समूह में एक बड़े बदलाव की शुरुआत है। अब टाटा ग्रुप को नए चेयरमैन की तलाश शुरू करनी होगी। यह बदलाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि चंद्रशेखरन उस दौर का हिस्सा रहे हैं, जिसकी शुरुआत रतन टाटा ने की थी। 2017 में एक गैर-पारसी और गैर-पारिवारिक पेशेवर को टाटा सन्स की कमान सौंपना अपने आप में ऐतिहासिक फैसला था। अब दस साल के बाद वही शख्स टाटा सन्स को अलविदा कहने की तैयारी कर रहा है।