World Milk Day: जब माफिया ने दूध के लिए बहायी खून की नादियां, जानिए क्या है ‘मिल्क वॉर’ की कहानी
World Milk Day: दूध आज एक आम सी चीज लगती है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इसे लेकर माफिया गैंग्स के बीच खूनी जंग लड़ी गई। लोगों को डराया गया और हत्याएं कराई गई। जानें क्या है मिल्क वॉर की कहानी?
- Written By: अक्षय साहू
शिकागो मिल्क वॉर (सोर्स- सोशल मीडिया)
Story of Chicago Milk War: आपने जमीन, धन, दौलत के लिए लड़ी गई कई युद्धों के बारे में सुना होगा। लेकिन इतिहास में एक ऐसी जंग भी लड़ी गई जिसका मकसद दूध के व्यापार के कब्जा करना था। जी हां, वही दूध जो आज आपको एक आम चीज लग सकती है, लेकिन अमेरिका के शिकागो शहर में एक दौरा ऐसा भी था, जब यहां के दूध के बिजनेस पर कब्जा जमाने के लिए खूनी लड़ाईयां लड़ी गई, व्यापारियों को धंधा छोड़ने के लिए डराया और जिन्होंने इससे इंकार किया उन्हें हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया गया। इस जंग को आज हम शिकागो मिल्क वॉर के नाम से जाने जाते है।
दुनियाभर में 1 जून की तारीख को ‘वर्ल्ड मिल्क डे’ के तौर पर मनाया जाता है। तो आइए आज हम आपको इस मौके पर दूध के लिए लड़ी गई उस लड़ाई के बारे में बताते हैं, जो 1930 के दशक शिकागो के गैंग्स के बीच गैंगवॉर की वजह बना और जिसकी चपेट में गैंगस्टर्स के साथ आम लोग भी आए।
शिकागो में दूध बनी हिंसा का कारण
शिकागो में दूध को लेकर तनाव 1910 और 1920 के दशक से ही चल रहा था। लेकिन इसे लेकर गैंगवॉर की शुरुआत 1930 दशक में हुई। 1932 से 1934 के बीच यह हिंसा अपने चरम पर थी। क्योंकि यही वो दौर था जब अवैध शराब धंधे से हर दिन लाखों डॉलर कमाने वाले गैंग्स की नजर दूध के बिजनेस पर पड़ी। दरअसल 1932 में किसानों और डिस्ट्रीब्यूटर्स के बीच दूध की कीमतों को लेकर विवाद शुरू हुआ। किसानों ने हड़ताल की और विरोध करते हुए हजारों लीटर दूध सड़क पर बहा दिया। नतीजतन दूध के दाम बढ़े और माफिया की नजर इस पर पड़ी।
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माफिया डॉन अल-कपोन (सोर्स- सोशल मीडिया)
शिकागो के कई माफिया गैंग्स ने इस विवाद का फायदा उठाते हुए जबरन वसूली करना शुरू कर दिया। लेकिन इसने सबसे बड़ा मोड़ तब लिया जब माफिया डॉन अल-कपोन ने दूध के बिजनेस में अपनी दिलचस्पी दिखाई। अल-कपोन न सिर्फ इस बिजनेस में उतरा, बल्कि उसने बाकी लोगों को इससे बाहर करना शुरू किया। कहा जाता है कि वो कपोन ही थी जिसने अपने रसूख के दाम दूध के बोतलों में एक्सपायरी डेट लिखने के नियम को बढ़ावा दिया। हालांकि, उसका मकसद कभी भी लोगों की भलाई नहीं था बल्कि वो इस तरह से अपने प्रतिद्वंद्वियों को व्यापार से बाहर करना चाहता था।
बढ़ते व्यापार ने दिया माफिया को न्योता
बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के सबसे बड़े शहरों में से एक था। यहां की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, साथ ही उनकी रोजमर्रा की जरूरतें भी। अब क्योंकि उस दौर में हर घर में रेफ्रिजरेटर होना आम बात नहीं थी। ऐसे में दूध जैसी चीज रोजाना जरूरत का हिस्सा थी। गांव में रहने वाले किसान दूध को शहरों, होटलों और डेयरी फार्म तक पहुंचाते थे। इस बिजनेस में बहुत पैसा था और इसी पैसे ने जल्द ही माफिया को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया।
दूध को लेकर प्रदर्शन करते किसान (सोर्स- सोशल मीडिया)
शिकागो के माफिया गैंग्स 1920 के दशक में अवैध शराब के धंधे से अच्छा पैसा कमा रहे थे, लेकिन जब 1930 में पुलिस और प्रशासन ने इस व्यापार पर लगाम लगाना शुरू किया। तब गैंग्स ने दूसरे धंधों की ओर देखना शुरू किया। इसमें उन्हें दूध का व्यापार सही लगा। वजह साफ थी दूध हर रोज बिकता था, हर घर में बिकता है। साथ ही इसमें मुनाफा भी अच्छा था। हालांकि, शुरुआत में गैंग्स सिर्फ उगाही करते थे लेकिन व्यापार के फायदे को देखते हुए वो खुद इसमें उतरा आए। अब उन्हें दूध के व्यापार में हिस्सा ने पूर्ण नियंत्रण चाहिए था।
व्यापार पर कब्जे को लेकर गैंगवॉर
इसके बाद कई गिरोह ने डेयरी व्यापारियों को डराकर उसके व्यापार पर कब्जा कर लिया, तो कई यूनियन में पैठ बनाकर फ्री की मलाई खाने का इंतजाम कर लिया। लेकिन जल्द ही ये गैंग्स व्यापार पर कब्जे के लिए आपस में ही लड़ने लगे। आए दिन दूध का गाड़ियां रोकी जाती, लोगों से मारपीट की जाती और दूध के दाम बढ़ाने के लिए हड़ताल करवा दिया जाता। जिसका भुगतान आम जनता को भुगतना पड़ता था।
दूध को लेकर होती थी गैंगवॉर (सोर्स- सोशल मीडिया)
शिकागो में दूध माफिया का खौफ लोगों को बीच इतनी ज्यादा बढ़ गया था कि, वो पुलिस के सामने गवाही देने से डरते थे। लोगों के मन में यह धारणा बैठ गई थी कि पुलिस उनकी रक्षा नहीं कर सकती है। हालांकि, पुलिस लगातार इन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी। हर दिन छापे मारे जाते, गिरफ्तारियां भी होती।
दूध की रखवाली करती पुलिस (सोर्स- सोशल मीडिया)
इस दौर में मीडिया ने इस मुद्दे को काफी प्रमुखता से उठाया। लोग हैरान थे कि दूध जैसी चीज के लिए कैसे कोई गैंगवॉर हो सकता है। हालांकि मीडिया द्वारा लगातार इस मुद्दे को उठाते रहने का परिणाम यह हुआ कि लोगों को यह समझाने में कामयाब रही कि यह केवल दूध का मुद्दा नहीं है। यह शहर की कानून व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था पर हमला है।
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कैसे खत्म हुआ शिकागो मिल्क वॉर?
मीडिया द्वारा मुद्दे को बार-बार उठाने पर लोग इसे जागरूक हुए। इसके साथ ही प्रशासन माफिया गिरोहों के खिलाफ और सख्ती से कार्रवाई करना शुरू किया। हालांकि, इसके बाद भी दूध को लेकर गैंगवॉर हिंसा की घटनाएं एकदम से खत्म नहीं हुई। सरकार ने धीरे-धीरे योजनाए बनाई, लंबे समय तक दूध व्यापार की निगरानी की और अपराधियों पर कानून के तहत कार्रवाई की। इसके अलावा लोगों को जागरूक करने के लिए जागरूकता अभियान चला। इस कड़ी मेहतन के बाद 1940 में जाकर शिकागो मिल्क वॉर का अंत हुआ।
