ओवल ऑफिस में डोनाल्ड ट्रंप के लिए प्रार्थना करते अमेरिकी सांसद (सोर्स- सोशल मीडिया)
US Religious War Against Iran: मध्य पूर्व में चल रही लड़ाई को अब एक हफ्ता होने वाला है, इस दैरान अमेरिका,इजरायल और ईरान की ओर से युद्ध को लेकर अलग-अलग तरह के बयान दिए हैं। इसी बीच अमेरिका और इजरायल ने इस युद्ध को अचानक धार्मिक रूप देना शुरू किया है। कई अमेरिकी और इजरायली नेता इसे ‘सिग्नल फायर’ की जंग बताने की कोशिश कर रहे है यानी वो युद्ध जिसके बाद जीसस क्राइस्ट दुनिया में फिर से जन्म लेंगे। लेकिन अमेरिका और इजरायली नेताओं के दावों में कितनी सच्चाई है? और क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को ईसा मसीह का चुना हुआ दूत साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?
मंगलवार को एक मुस्लिम अधिकार संगठन अमेरिकी-इस्लामिक संबंध परिषद (CAIR )ने अमेरिकी रक्षा विभाग के कुछ बयानों की कड़ी आलोचना की। संगठन ने कहा कि इस तरह की बातें खतरनाक हैं और मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ा सकती हैं।
अमेरिका और इजरायल ने शनिवार को ईरान पर हमला शुरू किया। उसके बाद से लगातार ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए जा रहे हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी पलटवार किया।
ईरान ने इजरायल के अंदर कई स्थानों को निशाना बनाया। इसके साथ ही उसने बहरीन, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमले किए।
एक अमेरिकी निगरानी संस्था सैन्य धार्मिक स्वतंत्रता फाउंडेशन (MRFF)ने दावा किया है कि कुछ अमेरिकी सैनिकों को बताया गया कि यह युद्ध बाइबिल में बताए गए “अंत समय” की घटनाओं से जुड़ा हो सकता है।
इस संस्था के अनुसार उन्हें कई सैनिकों की शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों में कहा गया कि कुछ अधिकारियों ने सैनिकों से कहा कि ईरान के साथ यह युद्ध “आर्मगेडन” नाम की अंतिम लड़ाई की शुरुआत हो सकता है।
एक गुमनाम सैनिक ने संस्था को लिखे संदेश में कहा कि एक कमांडर ने अधिकारियों से कहा कि वे सैनिकों को समझाएं कि यह सब “ईश्वर की योजना का हिस्सा” है। उस कमांडर ने बाइबिल की किताब Book of Revelation से भी कुछ बातें बताईं, जिसमें दुनिया के अंत और अंतिम युद्ध का जिक्र मिलता है।
Prayers for Donald Trump at Oval Office. pic.twitter.com/1Q9bJbwDUf — Open Source Intel (@Osint613) March 5, 2026
सैनिक के अनुसार कमांडर ने यह भी कहा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान में घटनाओं की शुरुआत करने के लिए चुना गया है, जिससे अंत समय की घटनाएं शुरू होंगी और फिर यीशु मसीह धरती पर लौटेंगे। यह संस्था अमेरिकी सेना में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए काम करती है।
इस संघर्ष के दौरान कुछ अमेरिकी और इजरायली नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से धार्मिक शब्दों का इस्तेमाल किया है। पिछले महीने इजरायल में अमेरिका के राजदूत माइक हकाबी ने एक बातचीत में कहा था कि अगर इजरायल पूरे मध्य पूर्व पर नियंत्रण कर ले तो यह गलत नहीं होगा, क्योंकि बाइबिल में इस भूमि का वादा किया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इजरायल ऐसा करने की कोशिश नहीं कर रहा।
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ईरान को “धार्मिक कट्टरपंथी लोग” चला रहे हैं और वे परमाणु हथियार बनाना चाहते हैं। इसी तरह अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी कहा कि ईरान जैसे शासन, जो धार्मिक भ्रमों में विश्वास रखते हैं, उनके पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए।
मुस्लिम अधिकार संगठन का कहना है कि ऐसे बयान शिया इस्लाम की कुछ धार्मिक मान्यताओं की ओर इशारा करते हैं और यह भाषा मुसलमानों को निशाना बना सकती है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी एक धार्मिक उदाहरण दिया। उन्होंने ईरान की तुलना बाइबिल में बताए गए एक पुराने दुश्मन “अमालेक” से की। यह कहानी ‘तोराह’ में मिलती है। यहूदी परंपरा में अमालेक को बुराई का प्रतीक माना जाता है। नेतन्याहू ने कहा कि तोराह में लिखा है कि अमालेक ने यहूदियों के साथ क्या किया था, इसे याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि इजरायल को भी यह याद है और वह उसी अनुसार कार्रवाई कर रहा है।
इस बयान की भी आलोचना हुई। आलोचकों का कहना है कि अमालेक की कहानी में यह कहा गया है कि दुश्मन के सभी लोगों को मार दिया जाए, इसलिए इस तरह का उदाहरण देना बहुत खतरनाक हो सकता है।
ब्रिटेन की डरहम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोलियन मिशेल का कहना है कि नेता अक्सर लोगों का समर्थन पाने के लिए धार्मिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार जब युद्ध को पवित्र युद्ध की तरह दिखाया जाता है तो लोग मानने लगते हैं कि ईश्वर उनकी तरफ है। इससे दुश्मन को पूरी तरह बुरा दिखाना आसान हो जाता है। लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि बाद में शांति स्थापित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
वहीं, कतर में स्थित नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इब्राहिम अल-अबू-शरीफ का कहना है कि ऐसी भाषा के पीछे कई कारण होते हैं। उन्होंने कहा कि नेता अक्सर तीन उद्देश्यों के लिए ऐसा करते हैं:
उनका कहना है कि जब किसी जटिल राजनीतिक संघर्ष को “अच्छाई और बुराई की लड़ाई” के रूप में दिखाया जाता है, तो आम लोगों के लिए उसे समझना आसान हो जाता है।
यह पहली बार नहीं है जब युद्ध के दौरान धार्मिक शब्दों का इस्तेमाल किया गया हो। साल 2001 में हुए 11 सितंबर के हमलों के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को “क्रूसेड” कहा था। क्रूसेड मध्यकाल में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच हुए धार्मिक युद्धों की एक श्रृंखला थी। बाद में अमेरिकी सरकार ने इस शब्द से दूरी बना ली क्योंकि इससे यह संदेश जा सकता था कि यह मुसलमानों के खिलाफ युद्ध है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़ा यह संघर्ष वास्तव में धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक है। इसमें क्षेत्रीय शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव जैसे मुद्दे शामिल हैं। लेकिन धार्मिक भाषा इस युद्ध को अलग रूप देती है। इससे लोगों में उत्साह पैदा होता है और युद्ध को नैतिक रूप से सही साबित करने में मदद मिलती है।
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विशेषज्ञों के अनुसार अगर युद्ध को पवित्र या धार्मिक बना दिया जाए तो समझौता करना बहुत कठिन हो जाता है। जब लोग मानने लगते हैं कि वे ईश्वर के लिए लड़ रहे हैं, तब शांति की बातचीत कमजोर पड़ जाती है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनाव बढ़ सकता है और समाधान ढूंढना मुश्किल हो सकता है।