US नेताओं की जुबान पर लगा गालियों का तड़का, ट्रंप-बाइडन ने तोड़े मर्यादा के सारे रिकॉर्ड; स्टडी में खुलासा
US Politics Swearing: कार्डिफ यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी के अनुसार, अमेरिकी राजनेताओं की भाषा का स्तर तेजी से गिरा है। 1919 के बाद से इस्तेमाल हुए कुल अपशब्दों में से 87% मामले पिछले 10 सालों के हैं।
- Written By: अमन उपाध्याय
ट्रंप और बाइडन पर स्टडी का बड़ा दावा, AI Photo
Study Reveals in Trump Biden Profanity: अमेरिकी राजनीति में भाषा की मर्यादा किस कदर गिरती जा रही है, इसका खुलासा हाल ही में आई एक रिपोर्ट में हुआ है। इस शोध में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि अमेरिकी राष्ट्रपति और शीर्ष राजनेता अब सार्वजनिक मंचों पर पहले से कहीं अधिक अपशब्दों और गालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
कार्डिफ यूनिवर्सिटी के राजनीति व्याख्याता डॉ. जोसेफ फिलिप्स द्वारा प्रकाशित इस शोध के अनुसार, साल 1919 से अब तक दर्ज किए गए कुल अपशब्दों में से 87 प्रतिशत मामले अकेले पिछले एक दशक में दर्ज किए गए हैं।
ट्रंप और बाइडन के दौर में गिरा स्तर
इस शोध के आंकड़े बताते हैं कि सन 1919 से लेकर अब तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों द्वारा सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज या अपशब्दों के इस्तेमाल के कुल 692 मामले दर्ज किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 87% मामले केवल पिछले 10 वर्षों के भीतर सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, इन मामलों में से 78% के लिए वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिम्मेदार हैं।
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हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप को जॉर्डन में अमेरिकी सेना पर हुए ईरानी हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते सुना गया। वहीं, जो बाइडन भी 2010 में ‘अफोर्डेबल केयर एक्ट’ पर हस्ताक्षर के दौरान माइक पर अपशब्द कहते हुए पकड़े गए थे, जो उस समय काफी चर्चा में रहा था।
नेताओं के गाली देने की क्या है वजह?
शोधकर्ता डॉ. फिलिप्स के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा का उपयोग करना कभी बेहद दुर्लभ हुआ करता था। साल 1919 में वुडरो विल्सन पहले ऐसे राष्ट्रपति बने थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से खुद के लिए एक हल्का अपशब्द इस्तेमाल किया था। लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप ने राजनीतिक संवाद में गालियों की एक पूरी श्रृंखला पेश कर दी है, जिसमें भाषणों से लेकर सोशल मीडिया पोस्ट तक शामिल हैं।
डोनाल्ड ट्रंप और बाइडेन, AI Photo
डॉ. फिलिप्स का तर्क है कि यह केवल किसी व्यक्ति विशेष का स्वभाव नहीं है, बल्कि राजनीतिक संचार के बदलते स्वरूप का हिस्सा है। उनका कहना है कि नेता अब अपशब्दों का इस्तेमाल प्रामाणिकता दिखाने के लिए करते हैं।
जब जनता का राजनीति पर भरोसा कम होता है तो नेताओं को लगता है कि आम लोगों की तरह गाली देने से वे अधिक भरोसेमंद नजर आएंगे। इसलिए वो सार्वजनिक रूप से ऐसा करने पर जमीन से जुड़ा हुआ महसूस होते हैं।
युवाओं की बदलती सोच
इस भाषाई गिरावट के पीछे समाज में बदलता नजरिया भी एक बड़ी वजह है। पिछले साल आए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, युवा पीढ़ी बुजुर्गों की तुलना में कार्यस्थल और सोशल मीडिया पर अपशब्दों के इस्तेमाल को लेकर अधिक उदार है। रिपोर्ट के मुताबिक, 18-29 वर्ष के 21% लोग बच्चों के सामने अपशब्द भाषा को सही मानते हैं जबकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के केवल 4% लोग ही इससे सहमत हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि वैचारिक मतभेद इतने गहरे हो चुके हैं कि अब मतदाता केवल खराब भाषा के आधार पर अपनी राजनीतिक निष्ठा नहीं बदलते बल्कि उन्हें लगता है कि अब यही सबकुछ है।
