‘सुनवाई-सजा एक तमाशा…’, शेख हसीना पक्ष में उठने लगी आवाजें, निशाने पर युनूस सरकार

Bangladesh News: मानवाधिकार समूह RRAG ने कहा कि शेख हसीना और सहयोगियों को दोषी ठहराना राजनीतिक नाटक है, क्योंकि मुकदमा अनुपस्थिति में चला और ठोस सबूत पेश नहीं किए गए।
sheikh-hasina-supporters-rise-voices-as-yunus-sarkar-faces-backlash
शेख हसीना, मोहम्मद यूनुस (सोर्स- सोशल मीडिया)
Published on: 
Updated on: 

Sheikh Hasina Extradition: नई दिल्ली के मानवाधिकार संगठन राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (RRAG) ने सोमवार को बांग्लादेश की बर्खास्त प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके दो सहयोगियों को दोषी ठहराने के फैसले की कड़ी आलोचना की। संगठन ने कहा कि यह फैसला एक राजनीतिक नाटक है और न्याय की गंभीर गलती है। असली दोषी लोग आज़ाद घूम रहे हैं, जबकि जिन्हें सजा दी गई है, उनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं।

बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने सोमवार को हसीना और दो पूर्व अधिकारियों को मानवता विरोधी अपराधों का दोषी ठहराया। फैसले के मुताबिक, शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को मौत की सजा और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-ममून को पाँच साल जेल की सजा दी गई। अदालत ने कहा कि यह सजा “जुलाई आंदोलन” के दौरान हुए दो कथित अपराधों के आधार पर दी गई है।

सुनवाई शामिल नहीं हुई हसीना

RRAG के निदेशक सुहास चकमा ने कहा कि पूरी सुनवाई हसीना की गैरमौजूदगी में हुई, जो न्याय के अंतरराष्ट्रीय मानकों के खिलाफ है। उनका कहना था कि अगर बांग्लादेश के पास पक्के सबूत होते, तो वह भारत से कानूनी तरीके से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करता जैसा भारत ने अबू सलेम और मेहुल चोकसी के मामलों में किया था।

चकमा ने कहा कि सबूतों की कमी के बावजूद यह मुकदमा जिस अदालत में चला, वह “कंगारू कोर्ट” जैसी थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ढाका, रंगपुर और अशुलिया में हिंसा और हत्याओं के असली आरोपियों के नाम आरोपपत्र में नहीं हैं, तो इन मामलों के लिए शेख हसीना और उनके सहयोगियों को कैसे दोषी ठहराया गया? उन्होंने यह भी कहा कि अल-ममून घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे, इसलिए उन्हें सरकारी गवाह नहीं माना जा सकता।

बिना वैध सबूतों के सुनवाई

चकमा ने यह भी आरोप लगाया कि अदालत ने OHCHR और HRW जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन उनके प्रतिनिधियों को अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया ही नहीं गया। उनका कहना था कि जब मामला मौत की सजा जैसा गंभीर हो, तो ऐसे दस्तावेज तभी मान्य होते हैं जब लेखक खुद आकर अपनी बात की पुष्टि करें।

एजेंसी इनपुट के साथ-

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com