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दोस्ती की कीमत चुकाएगा तुर्की! भारत की इस चाल ने राष्ट्रपति एर्दोगन की उड़ाई नींद

G-7 सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कनाडा जा रहे हैं लेकिन उससे पहले वे साइप्रस में रूकेंगे। यह दौरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि साइप्रस और तुर्की के बीच दशकों पुराना...

  • By अमन उपाध्याय
Updated On: Jun 10, 2025 | 05:49 PM

भारत की चाल से तुर्की को लगा सकता है बड़ा झटका, फोटो (सो.सोशल मीडिया)

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तुर्की ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष के समय आतंकवादी नेताओं का खुलकर समर्थन किया था। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना की कार्रवाई में मारे गए आतंकियों के लिए संवेदना व्यक्त की थी और उन्हें श्रद्धांजलि भी दी थी।
भारत अब एक ऐसा फैसला लेने वाला है जो पाकिस्तान के प्रमुख सहयोगी तुर्की को नाराज कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस देश की यात्रा पर जाने वाले हैं जिसके एक भू-भाग पर तुर्की ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 से 17 जून तक कनाडा में होने वाले G-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं। हालांकि, कनाडा की यात्रा से पहले वे साइप्रस का दौरा करेंगे। यह दौरा रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब भारत का पाकिस्तान और तुर्की के साथ तनाव चल रहा है। साइप्रस और तुर्की के बीच 1974 से ही विवाद चला आ रहा है, क्योंकि तुर्की साइप्रस के एक हिस्से पर अपना कब्जा बनाए हुए है और इसे छोड़ने को तैयार नहीं है।

23 साल बाद भारतीय पीएम का दौरा

वर्ष 2002 के बाद से लगभग 23 वर्षों तक कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री साइप्रस नहीं गया। पीएम मोदी के पहले सिर्फ दो प्रधानमंत्रियों ने ही साइप्रस की यात्रा की थी। 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी और 1983 में इंदिरा गांधी ने दौरा किया था। इसलिए, पीएम मोदी की यह यात्रा दो दशकों से अधिक समय के बाद साइप्रस की ओर से भारत का एक महत्वपूर्ण राजनयिक कदम माना जा रहा है।

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आखिर क्या है विवाद का जड़

साइप्रस और तुर्की के बीच लंबे समय से चले आ रहे एक विवाद है। साइप्रस भूमध्य सागर में स्थित एक द्वीपीय देश है, जो तुर्की के दक्षिणी तट के पास मौजूद है। इसके पश्चिम में सीरिया और उत्तर-पश्चिम में इजरायल स्थित है। साइप्रस में मुख्य रूप से ग्रीक और तुर्क मूल के लोग निवास करते हैं, जिनके बीच जातीय तनाव का इतिहास रहा है। 1974 में ग्रीक समुदाय से जुड़े सैन्य गुटों ने साइप्रस में सत्ता पलटने का प्रयास किया, जिसके जवाब में तुर्की ने तुर्क-साइप्रियट लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए द्वीप पर सैन्य कार्रवाई की और उसके उत्तरी भाग पर कब्ज़ा कर लिया।

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तुर्की ने साइप्रस पर आक्रमण करके उसके प्रसिद्ध शहर वरोशा पर कब्जा कर लिया था। वरोशा कभी एक संपन्न शहर हुआ करता था, लेकिन तुर्की के हमले के बाद से यह पूरी तरह से वीरान पड़ा है। तुर्की ने इस क्षेत्र में हजारों सैनिक तैनात कर रखे हैं। इस आक्रमण के बाद साइप्रस दो भागों में बंट गया। तुर्की-समर्थित साइप्रियट तुर्कों ने तुर्की के कब्जे वाले हिस्से को एक अलग देश घोषित कर दिया, लेकिन तुर्की को छोड़कर किसी भी अन्य देश ने इसे मान्यता नहीं दी है।

वहीं, संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने साइप्रस को एक ही देश के रूप में मान्यता दी हुई है। दोनों हिस्सों के बीच संयुक्त राष्ट्र की निगरानी वाला एक बफर जोन बनाया गया है। साइप्रस के दोनों भागों को फिर से एक करने के लिए कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए गए, लेकिन अब तक सभी कोशिशें नाकाम रही हैं।

भारत का हमेशा समर्थन किया है साइप्रस

भारत और साइप्रस के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर आपसी समर्थन और साझा सिद्धांतों पर आधारित हैं। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र के प्रावधानों और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत साइप्रस समस्या के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, साइप्रस ने भारत के लिए कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महत्वपूर्ण समर्थन दिया है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की उम्मीदवारी का समर्थन भी शामिल है। 1998 में भारत के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षणों के बाद जब कई देशों ने भारत की आलोचना की थी। उस समय साइप्रस ने भारत के अधिकार का समर्थन किया था।

Pm modi cyprus visit during canada tour turkey reaction

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Published On: Jun 10, 2025 | 05:45 PM

Topics:  

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