तख्तापलट की खुली धमकी! अफगानिस्तान-भारत की दोस्ती घबड़ाया पाकिस्तान, शहबाज का चाल से बढ़ी हलचल
Pakistan Taliban Ultimatum: अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वह या तो सुरक्षा शर्तें माने या फिर इस्लामाबाद अफगान सरकार विरोधी शक्तियों को समर्थन देगा।
- Written By: अमन उपाध्याय
तख्तापलट की खुली धमकी, (डिजाइन फोटो)
Pakistan Taliban Conflict: अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की रणनीति में बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ सामने आया है। शीर्ष खुफिया तथा कूटनीतिक सूत्रों की मानें तो इस्लामाबाद ने अफगान तालिबान नेतृत्व को अपना “आखिरी संदेश” भेज दिया है।
इस संदेश में दो ही विकल्प दिए गए हैं या तो तालिबान पाकिस्तान के साथ मेल-मिलाप की राह चुने और उसकी सुरक्षा शर्तों को स्वीकार करे, या फिर पाकिस्तान उन राजनीतिक समूहों का समर्थन शुरू करेगा जो तालिबान शासन को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। यह पहली बार है जब पाकिस्तान ने सीधे तौर पर तालिबान शासन में बदलाव या तख्तापलट जैसे संकेत दिए हैं।
तुर्की के माध्यम से तालिबान तक भेजा संदेश
सूत्रों के अनुसार यह कड़ा संदेश तुर्की के माध्यम से तालिबान तक पहुंचाया गया। पिछले कई महीनों से पाकिस्तान और तालिबान के बीच बातचीत चल रही थी, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। मुख्य वजह रही तालिबान की तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पर कार्रवाई करने से सख्त ना, जबकि पाकिस्तान सीमा पार बढ़ते आतंकी हमलों से चिंतित है।
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स्थिति तब और बदल गई जब तालिबान ने भारत के साथ अपने कूटनीतिक दरवाजे खोलने शुरू किए। अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी के हालिया भारत दौरे ने पाकिस्तान की बेचैनी को और बढ़ा दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान का भारत के प्रति झुकाव इस्लामाबाद के लिए न सिर्फ सुरक्षा बल्कि भू-रणनीतिक चुनौती भी बन रहा है।
अफगान नीति को बदलने का फैसला
इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने अपनी अफगान नीति को मूलभूत रूप से बदलने का फैसला किया है। सूत्रों का दावा है कि इस्लामाबाद अफगानिस्तान के विभिन्न लोकतांत्रिक, निर्वासित और विरोधी नेताओं से दोबारा संपर्क स्थापित कर रहा है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, अशरफ गनी, राष्ट्रीय प्रतिरोध मोर्चा (NRF) के अहमद मसूद, अब्दुल रशीद दोस्तम, अफगानिस्तान फ्रीडम फ्रंट और नॉर्दर्न अलायंस से जुड़े कई प्रभावशाली कमांडर शामिल हैं।
पाकिस्तान ने कथित तौर पर इन नेताओं को राजनीतिक स्पेस से लेकर सुरक्षित उपस्थिति और कार्यालय की सुविधा देने का प्रस्ताव दिया है। यह संकेत है कि पाकिस्तान पहली बार एक संगठित अफगान विपक्ष खड़ा करने की दिशा में गंभीरता से सोच रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह प्रस्ताव अफगान महिला नेताओं, लोकतांत्रिक एक्टिविस्टों और विदेशी निर्वासित समूहों तक भी बढ़ाया गया है।
TTP पर सख्त कार्रवाई की मांग
तालिबान और पाकिस्तान की बातचीत अब तक तीन राउंड में भी किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुंच सकी। पहले दौर कतर में, फिर तुर्की में हुआ, लेकिन आखिरी दौर पूरी तरह असफल रहा। दोनों पक्ष अस्थायी युद्धविराम पर सहमत तो हुए थे, लेकिन वह भी आगे नहीं बढ़ सका। बातचीत के दौरान पाकिस्तान की मुख्य मांगें थीं TTP पर सख्त कार्रवाई, पकड़े गए TTP आतंकियों को पाकिस्तान को सौंपना, डूरंड लाइन पर शांति सुनिश्चित करना, सीमा पर बफर जोन बनाना और व्यापारिक संबंधों को सामान्य करना।
सैन्य ठिकानों पर बढ़ रहे लगातार हमले
लेकिन तालिबान ने विशेष रूप से TTP सदस्यों को पाकिस्तान को सौंपने और सीमा पर बफर ज़ोन जैसी मांगों को ठुकरा दिया। तालिबान का कहना है कि ये कदम उसकी संप्रभुता और आंतरिक राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान का दावा है कि ये शर्तें उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि उसके सैन्य ठिकानों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं।
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स्थिति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां पाकिस्तान खुले तौर पर तालिबान सरकार के विरुद्ध नए राजनीतिक समीकरण बनाने में जुट गया है। आने वाले महीनों में यह रणनीतिक टकराव अफगानिस्तान और संपूर्ण दक्षिण एशिया की राजनीति को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
