नेपाल चुनावों में बढ़ा तनाव! सुरक्षा परिषद ने सेना बुलाने की सिफारिश, कई इलाकों से कर्फ्यू भी हटा
Nepal elections 2026: नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने 5 मार्च 2026 को होने वाले आम चुनावों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सेना तैनात करने की सिफारिश की है। Gen-Z आंदोलन से हालात फिर...
- Written By: अमन उपाध्याय
नेपाल में बढ़ा तनाव, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Gen-Z protests In Nepal: नेपाल में मार्च 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हो गई हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) ने गुरुवार को देश की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा करते हुए चुनावों के दौरान सेना तैनात करने की महत्वपूर्ण सिफारिश की है। परिषद का कहना है कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह कदम बेहद आवश्यक है।
रक्षा सचिव सुमन राज आर्यल, जो एनएससी के सदस्य सचिव भी हैं, ने स्पष्ट किया कि चुनावों के शांतिपूर्ण संचालन के लिए सुरक्षा बलों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। इस दिशा में गृह मंत्रालय पहले ही एक एकीकृत सुरक्षा योजना को मंजूरी दे चुका है, जिसे क्रियान्वयन के लिए सभी 77 जिला प्रशासन कार्यालयों को भेज दिया गया है।
क्या है सुरक्षा योजना?
इस व्यापक सुरक्षा योजना के तहत, देश के हर जिले को अपनी स्थिति के अनुरूप अलग-अलग सुरक्षा रणनीति तैयार करनी होगी। प्रत्येक मतदान केंद्र पर नेपाल आर्मी, नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और राष्ट्रीय जांच विभाग की संयुक्त तैनाती की जाएगी। इसका उद्देश्य मतदान केंद्रों की सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत करना और किसी भी संभावित अव्यवस्था को रोकना है।
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बारा जिले में कर्फ्यू समाप्त
भारतीय सीमा से सटे बारा जिले में पिछले कुछ दिनों से तनावपूर्ण हालात थे। यहां Gen-Z प्रदर्शनकारियों और अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें हुई थीं, जिसके बाद कई इलाकों में कर्फ्यू लागू किया गया था। शुक्रवार को प्रशासन ने कर्फ्यू हटाने की घोषणा कर दी और सामान्य जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगा। बाजार खुल गए हैं, स्कूलों में कक्षाएं शुरू हो गई हैं और परिवहन सेवाएं भी बहाल कर दी गई हैं।
फिर भड़का Gen-Z आंदोलन
नेपाल में ‘Gen-Z आंदोलन’ एक बार फिर उभर आया है। बुधवार से शुरू हुए इस नए दौर के प्रदर्शनों ने कई शहरों में तनाव बढ़ा दिया है। इससे पहले सितंबर में हुए उग्र Gen-Z विद्रोह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया था। उस राजनीतिक अस्थिरता के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
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इसको लेकर बारा समेत कई जिलों में प्रशासन ने एहतियातन सार्वजनिक सभाओं, रैलियों और बड़े आयोजनों पर रोक लगा दी है ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में रहे। चुनाव नजदीक हैं और लगातार भड़क रहे युवा आंदोलनों ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में सेना की तैनाती की सिफारिश को देश की सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
