‘परमाणु बम ही सुरक्षा की पक्की गारंटी’, पूर्व रूसी राष्ट्रपति के बयान से मचा तहलका; बोले- और कोई रास्ता नहीं
Russia Ukraine War: रूस के पूर्व राष्ट्रपति मेदवेदेव ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। उन्होंने दावा किया है कि दुनिया की अस्थिरता को देखते हुए परमाणु हथियार ही किसी देश की सुरक्षा की गारंटी हैं।
- Written By: अमन उपाध्याय
रूस के पूर्व राष्ट्रपति मेदवेदेव, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Dmitry Medvedev Nuclear Weapons: रूस के पूर्व राष्ट्रपति और रूसी सिक्योरिटी काउंसिल के डिप्टी चेयरमैन दिमित्री मेदवेदेव ने एक बार फिर अपने तीखे बयानों से वैश्विक राजनीति में तनाव पैदा कर दिया है। मेदवेदेव ने कहा है कि ‘सामूहिक विनाश के हथियार (WMD) ही राष्ट्रीय सुरक्षा की एकमात्र पक्की गारंटी हैं’।
उन्होंने तर्क दिया कि परमाणु हथियार न केवल संघर्षों का खतरा बढ़ाते हैं, बल्कि वे दूसरे देशों के खिलाफ खतरनाक इरादे रखने वाले किसी भी व्यक्ति के दिमाग में डिटरेंट का काम करते हैं।
‘इंसानियत के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं’
रूसी अखबार ‘Kommersant’ को दिए इंटरव्यू में मेदवेदेव ने विश्व व्यवस्था में पड़ी दरार पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज कई देश अपनी रक्षा के लिए सबसे असरदार तरीके खोज रहे हैं और अंततः वे न्यूक्लियर हथियार हासिल करने का फैसला करेंगे। उनके अनुसार, भले ही यह इंसानियत के हित में न हो लेकिन सच यह है कि मानवता ने अभी तक खुद की रक्षा और संप्रभुता की गारंटी देने का परमाणु हथियारों के अलावा कोई और तरीका नहीं खोजा है।
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रूस की शक्ति और पश्चिमी ‘उकसावे’
मेदवेदेव ने जोर देकर कहा कि रूस ने केवल अपने परमाणु शस्त्रागार की वजह से ही अपनी संप्रभुता बनाए रखी है। उन्होंने बाइडेन प्रशासन और यूरोपीय देशों पर रूस को उकसाने का आरोप लगाया और बताया कि रूस लगातार नए मिसाइलें विकसित कर रहा है। हाल ही में यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल की गई ‘ओरेश्निक’ मीडियम-रेंज मिसाइल इसका एक उदाहरण है जिसका परमाणु वर्जन भी संभव है।
अमेरिका के ‘गोल्डन डोम’ पर निशाना
मेदवेदेव ने अमेरिका के ‘गोल्डन डोम‘ मिसाइल डिफेंस सिस्टम को रूस के लिए बेहद खतरनाक और उकसावे वाला बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के सिस्टम वैश्विक रणनीतिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। उन्होंने परमाणु हथियारों को कम करने वाली ‘न्यू START’ संधि के जल्द खत्म होने की ओर भी इशारा किया।
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परमाणु प्रसार का इतिहास और वर्तमान
द सोर्सेज के अनुसार, 1968 की परमाणु अप्रसार संधि के बाद भी भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने परमाणु क्षमता हासिल की है, जबकि इजरायल के पास भी यह क्षमता मानी जाती है। मेदवेदेव का मानना है कि दुनिया की अस्थिरता अब कई अन्य तकनीकी रूप से सक्षम देशों को इसी रास्ते पर चलने को मजबूर कर रही है।
