फ्रेडरिक मर्ज़ और डोनाल्ड ट्रम्प, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Germany Distances From Iran War: मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, जर्मनी ने इस युद्ध से खुद को पूरी तरह अलग करने का फैसला किया है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने शुक्रवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान देते हुए साफ कर दिया कि जर्मनी इस संघर्ष में किसी भी तरह की सैन्य भागीदारी नहीं करेगा।
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने शुक्रवार को नॉर्वे के अपने आधिकारिक दौरे के दौरान युद्ध को लेकर जर्मनी की नीति स्पष्ट की। नॉर्वे के एंडेनेस शहर में अपने समकक्ष जोनास गहर स्टोर के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मर्ज ने कहा कि जर्मनी इस युद्ध का हिस्सा नहीं है और न ही हम इसका हिस्सा बनना चाहते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर है और अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चला रहा है।
जर्मनी का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ईरान ने हाल ही में नाटो देशों फ्रांस, इटली और तुर्की के सैन्य बेस पर भी हमले किए हैं। इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई थी कि क्या सभी नाटो देश मिलकर ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में उतरेंगे। हालांकि, चांसलर मर्ज के बयान ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी कम से कम इस समय सीधे टकराव की स्थिति से बचना चाहता है।
ईरान युद्ध के साथ-साथ जर्मनी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया आर्थिक फैसले पर भी कड़ी नाराजगी जताई है। दरअसल, अमेरिकी सरकार ने समुद्र में फंसे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद पर लगे कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है।
जर्मन चांसलर ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘गलत संदेश’ बताया है। उन्होंने खुलासा किया कि G7 समूह के सात में से छह सदस्यों ने इस फैसले पर स्पष्ट असहमति जताई थी। मर्ज ने कहा, ‘G7 के छह देशों ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि यह सही संकेत नहीं है, लेकिन अमेरिकी सरकार ने एक अलग रास्ता चुना। हमें लगता है कि यह एक गलत निर्णय है।’
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मौजूदा वैश्विक ऊर्जा संकट पर भी जर्मनी ने अपनी अलग राय रखी है। चांसलर मर्ज का मानना है कि वर्तमान संकट में मुख्य समस्या तेल की आपूर्ति की कमी नहीं है बल्कि इसकी अत्यधिक कीमतें हैं। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिसके बाद ही अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर सीमित अवधि के लिए अनुमति दी है। जर्मनी अब यह जानने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका ने यह फैसला किन अन्य कारणों से लिया है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार और कूटनीति पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।