अमेरिका के भारी खर्च के बाद भी नहीं हिली ईरान की इस्लामिक सरकार (सोर्स-सोशल मीडिया)
Tehran Government Collapse Risk Low: पश्चिमी एशिया के आसमान में बारूद की गंध अभी भी बरकरार है और अमेरिका-इजरायल की बमबारी को 12 दिन बीत चुके हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस मकसद से यह युद्ध शुरू किया था, वह अब कूटनीतिक सवालों के घेरे में आता दिख रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्ट ने व्हाइट हाउस और ट्रंप प्रशासन की रातों की नींद हराम कर दी है। तेहरान सरकार गिरने का खतरा कम होने की वजह से अब इस पूरे सैन्य अभियान की सफलता और खर्च पर सवाल उठने लगे हैं।
पेंटागन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही 11.3 अरब डॉलर खर्च कर दिए हैं। भारतीय मुद्रा में यह बड़ी रकम करीब 94 हजार करोड़ रुपये बैठती है जो अमेरिकी खजाने पर एक बहुत बड़ा बोझ है। इतने बड़े खर्च के बाद भी रणनीतिक नतीजे ट्रंप की शुरुआती उम्मीदों के मुताबिक नजर नहीं आ रहे हैं।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि दो हफ्तों की भीषण बमबारी के बाद भी ईरान का शीर्ष नेतृत्व सुरक्षित है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में वहां की सरकार के गिरने का कोई भी तत्काल या स्पष्ट खतरा नहीं दिख रहा है। इजराइली अधिकारी भी गोपनीय चर्चाओं में स्वीकार कर रहे हैं कि यह युद्ध ईरान के धार्मिक शासन के पतन की गारंटी नहीं है।
28 फरवरी को हुए हमलों की पहली लहर में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई थी। इसके बावजूद ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व में कोई दरार नहीं दिखी है और वे अभी भी पूरी तरह एकजुट हैं। रिवोल्यूशनरी गार्ड और अंतरिम नेता अभी भी देश की जनता और प्रशासनिक व्यवस्था पर अपना मजबूत नियंत्रण बनाए हुए हैं।
ट्रंप के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बार-बार अपने युद्ध के लक्ष्यों और इरादों को बदल रहे हैं। शुरुआत में उन्होंने ईरानी जनता से सत्ता संभालने को कहा था, लेकिन बाद में उनके सहयोगियों ने नेतृत्व हटाने से इनकार किया। अब ट्रंप के सामने अपने उन समर्थकों को जवाब देने की चुनौती है जिनसे उन्होंने बिना मतलब की जंग न लड़ने का वादा किया था।
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दुनिया भर में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने अमेरिका के भीतर भी ट्रंप पर राजनीतिक दबाव को काफी बढ़ा दिया है। ट्रंप भले ही दावा कर रहे हों कि ईरान घुटनों पर है, लेकिन हकीकत में वहां की सरकार की मजबूती उन्हें परेशान कर रही है। अगर यह युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ तो ट्रंप के लिए इसे एक बड़ी जीत के रूप में पेश करना काफी मुश्किल होगा।
इस जंग के खौफ ने अमेरिकी जनता के मन में परमाणु युद्ध का डर पैदा कर दिया है और वे बंकर बनवाने लगे हैं। पिछले दो महीनों में वहां बंकरों के इतने ऑर्डर मिले हैं जितने पिछले तीन सालों में मिलाकर भी नहीं आए थे। यह असामान्य स्थिति दर्शाती है कि युद्ध का मनोवैज्ञानिक प्रभाव केवल सरहद तक नहीं बल्कि अमेरिकी घरों तक पहुंच गया है।