ईरान पर हमले की फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Iran US Conflict Economic Loss: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और हालिया संघर्ष ने न केवल मध्य-पूर्व की भू-राजनीति को प्रभावित किया है, बल्कि ईरान की अर्थव्यवस्था को विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, ईरान सरकार ने युद्ध के दौरान हुए नुकसान का आकलन करना शुरू कर दिया है और अब तक का कुल आंकड़ा 250 अरब डॉलर की भारी-भरकम सीमा को पार कर चुका है।
ईरान सरकार की प्रवक्ता फातेमा मोहाजेरानी ने मीडिया को जानकारी दी है कि शुरुआती अनुमानों के अनुसार, अमेरिका और इजरायली हमलों के कारण देश को लगभग 270 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति हुई है। उन्होंने बताया कि सरकार इस नुकसान का मूल्यांकन दो मुख्य चरणों में कर रही है।
पहले चरण में उन इमारतों और बुनियादी ढांचे की गिनती की जा रही है जो हमलों में पूरी तरह ध्वस्त या क्षतिग्रस्त हो गए हैं। वहीं, दूसरे चरण में बजट राजस्व की हानि और औद्योगिक केंद्रों के बंद होने से हुए आर्थिक घाटे का सटीक विवरण जुटाया जाएगा।
ईरान के सेंट्रल बैंक ने राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें देश की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, मात्र 40 दिनों के युद्ध ने ईरान की पहले से ही नाजुक अर्थव्यवस्था को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। वरिष्ठ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मंदी और तबाही से बाहर निकलकर अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने में ईरान को कम से कम 12 साल का समय लग सकता है।
इस युद्ध में ईरान के रणनीतिक संस्थानों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई महत्वपूर्ण हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचा है, जिससे रसद और परिवहन व्यवस्था बाधित हुई है।
इसके अलावा, तेल के मुख्य ठिकानों, रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल संस्थानों पर हुए हमलों ने ईरान के राजस्व के प्राथमिक स्रोत को गंभीर चोट पहुंचाई है। अधिकारियों ने सचेत किया है कि यदि औद्योगिक इनपुट सप्लाई में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में महंगाई की दर 180 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
विनाश के इस दौर के बीच कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि अगले सप्ताह युद्धविराम की अवधि समाप्त होने से पहले अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की सीधी वार्ता हो सकती है।
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इस बैठक के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को एक संभावित स्थल के रूप में देखा जा रहा है जबकि जिनेवा के नाम पर भी विचार किया जा रहा है। ईरान की वार्ता टीम का एक प्रमुख मुद्दा अमेरिका से सैन्य हर्जाना वसूलना है ताकि युद्ध से हुई तबाही की कुछ भरपाई की जा सके।