सांकेतिक एआई डिजाइन, फोटो
Iran Chinese Spy Satellite Targeting US Bases: मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक ऐसी सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आई है, जिसने वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक हड़कंप मचा दिया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने अमेरिका के खिलाफ युद्ध में चीन के जासूसी सैटेलाइट की मदद ली है। इस हाई-टेक मदद की बदौलत ईरान ने उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सटीक पहचान की और उन पर हमले किए, जिन्हें अमेरिकी सुरक्षा कवच में बेहद सुरक्षित माना जाता था।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे ऑपरेशन के केंद्र में ‘TEE-01B’ नामक एक शक्तिशाली सैटेलाइट है। इस सैटेलाइट को चीन की निजी कंपनी ‘अर्थ आई’ (Earth Eye) ने विकसित किया है जो अंतरिक्ष में ‘इन-ऑर्बिट डिलीवरी’ की सेवाएं देती है। यह सैटेलाइट आधा मीटर के रिजॉल्यूशन तक की बेहद स्पष्ट तस्वीरें खींचने में सक्षम है।
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की एयरोस्पेस फोर्स ने साल 2024 के अंत में इस सैटेलाइट को अधिग्रहित किया था। जिसके बाद इसका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए शुरू कर दिया गया।
जांच में यह बात सामने आई है कि TEE-01B ने 13 से 15 मार्च के बीच सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस की विस्तृत रेकी की थी। इस सटीक जानकारी के आधार पर ईरान ने हमला किया, जिसकी पुष्टि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी की थी। ट्रंप ने स्वीकार किया था कि इस हमले में अमेरिकी वायुसेना के पांच रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट पूरी तरह तबाह हो गए थे।
इसके अलावा, ईरान ने जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्टी एयरबेस, बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे और इराक के एरबिल हवाई अड्डे की भी इसी सैटेलाइट के जरिए निगरानी की थी।
ईरान के पास पहले अपना स्वदेशी ‘नूर-3’ (Noor-3) सैटेलाइट मौजूद था लेकिन इसकी इमेजरी क्षमता केवल 12-15 मीटर तक ही सीमित थी। चीन से मिले TEE-01B सैटेलाइट की सटीकता नूर-3 से लगभग 10 गुना ज्यादा है। इस बेहतर तकनीक की मदद से ईरान ने न केवल अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं, बल्कि उसने अत्याधुनिक F-16 और F-35 जैसे फाइटर जेट्स को भी मार गिराने का दावा किया है। हमले की योजना बनाने और उसके बाद हुए नुकसान (BATTLE DAMAGE ASSESSMENT) की जांच के लिए भी इसी सैटेलाइट का उपयोग किया गया।
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ईरान मामलों की विशेषज्ञ निकोल ग्रेजेव्स्की के अनुसार, चूंकि इस सैटेलाइट का नियंत्रण नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम के बजाय IRGC की एयरोस्पेस फोर्स के पास है इसलिए इसके सैन्य उपयोग पर कोई संदेह नहीं रह जाता है। युद्ध के दौरान इस तरह की विदेशी तकनीक की सहायता ने ईरान को रणनीतिक बढ़त दी है जिससे वह अमेरिका-इजरायल जैसे दुश्मनों को कड़ी टक्कर देने में सक्षम हुआ है।