यूरोपीय संघ के हथियार निर्यात में 36% की वृद्धि हुई (सोर्स-सोशल मीडिया)
Europe Becoming Global Arms Supplier: सिपरी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार यूरोप एक बार फिर से रक्षा क्षेत्र में दुनिया की महाशक्ति बनकर उभर रहा है जिससे वैश्विक समीकरण बदल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध और बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थितियों ने यूरोपीय देशों को हथियारों के उत्पादन और निर्यात में दुनिया का नया केंद्र बना दिया है। यूरोप वैश्विक हथियार आपूर्तिकर्ता के इस दौर में अब रूस और चीन जैसे देशों का पुराना दबदबा काफी कम होता नजर आ रहा है। अमेरिका पर सुरक्षा निर्भरता कम करने की होड़ ने यूरोप को एक नए आर्थिक और सैन्य युग की दहलीज पर खड़ा कर दिया है।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच वर्षों में यूरोपीय संघ के हथियार निर्यात में 36 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि दर अमेरिका की 27 प्रतिशत और चीन की 11 प्रतिशत की दर से काफी अधिक है जो यूरोप की बढ़ती आत्मनिर्भरता को दर्शाती है। वैश्विक हथियार बाजार में अब यूरोप की कुल हिस्सेदारी 28 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो रूस के कुल निर्यात से अब चार गुना अधिक है।
यूरोप के इस उदय के बीच उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी रूस के हथियार बाजार को भारी नुकसान हुआ है जिसके निर्यात में 64 प्रतिशत की गिरावट आई है। युद्ध की वजह से रूस के पुराने ग्राहक अब उसका साथ छोड़ रहे हैं क्योंकि रूसी तकनीक अब आधुनिक युद्धों में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो रही है। अब चीन जैसे देश भी अपने जेट इंजनों के लिए रूस पर निर्भर नहीं हैं जिससे रूस की रक्षा अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है।
यूरोप ने सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप (SAFE) कार्यक्रम के तहत 150 अरब यूरो यानी 175 अरब डॉलर का एक बड़ा निवेश रक्षा क्षेत्र में किया है। इसमें से 113 अरब यूरो या डॉलर सदस्य देशों को आवंटित किए जा चुके हैं ताकि वे आपसी सहयोग से अपनी सैन्य प्रणालियों को मजबूत कर सकें। इसके अलावा यूक्रेन को भी अब तक 195 अरब यूरो यानी 230 अरब डॉलर की भारी सहायता राशि यूरोप द्वारा सुरक्षा के लिए भेजी जा चुकी है।
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इतनी प्रगति के बावजूद पूर्वी यूरोप के देश आज भी अपनी आधुनिक सुरक्षा तकनीक और मिसाइल प्रणालियों के लिए काफी हद तक अमेरिका पर ही निर्भर हैं। कई देश आज भी एफ-35 जेट और पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसी तकनीक को प्राथमिकता देते हैं जिसे वे दुनिया में तकनीकी रूप से सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ के रुख ने यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उन्हें अब खुद ही आत्मनिर्भर बनना होगा।