बकरीद पर ना करें कुर्बानी, फोटो ( सो. सोशल मीडिया )
नवभारत इंटरनेशनल डेस्क: मोरक्को के किंग मोहम्मद VI ने इस साल ईद उल-अजहा (बकरीद) पर कुर्बानी न करने की अपील की है। इसका कारण देश में मवेशियों की गंभीर कमी और पिछले सात वर्षों से जारी सूखा बताया गया है। मोरक्को में भेड़ों की संख्या बीते दशक में 38% तक घट चुकी है, और इस साल औसत से 53% कम बारिश हुई है, जिससे चरागाहों की स्थिति बिगड़ गई है। इसके चलते मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध कराना मुश्किल हो गया है और मांस उत्पादन में भी कमी आई है।
ईद-उल-अजहा इस्लाम का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसमें भेड़, बकरी या अन्य पशुओं की कुर्बानी दी जाती है और उनका मांस परिवार व जरूरतमंदों में बांटा जाता है। हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए, किंग मोहम्मद VI ने लोगों से अनुरोध किया है कि वे इस परंपरा को परिस्थितियों के अनुसार समायोजित करें।
मोरक्को के धार्मिक मामलों के मंत्री अहमद तौफीक ने बुधवार को राष्ट्रीय टेलीविजन पर राजा का संदेश पढ़कर सुनाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि धार्मिक परंपराओं को आसानी से निभाने की व्यवस्था करना सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन और आर्थिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
मोरक्को में इस साल बारिश सामान्य से 53% कम हुई है, जो पिछले 30 वर्षों में सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। इस सूखे के कारण मवेशियों के लिए चारे की भारी कमी हो गई है, जिससे मांस उत्पादन में गिरावट आई है। नतीजतन, स्थानीय बाजार में मांस की कीमतें बढ़ गई हैं, और जीवित पशुओं, भेड़ों और लाल मांस का आयात बढ़ा है।
मोरक्को के कृषि मंत्री अहमद बोआरी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि पानी की प्राथमिकता पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए दी जा रही है, जिससे कृषि क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कई सिंचाई क्षेत्रों में कड़े नियम लागू किए गए हैं और जल राशनिंग की जा रही है।
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मोरक्को सरकार ने देश में मांस की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण पाने के लिए ऑस्ट्रेलिया से 100,000 भेड़ों के आयात का समझौता किया है। इसके साथ ही, सरकार ने मवेशियों, भेड़ों, ऊंटों और रेड मीट के आयात पर लगने वाले शुल्क और वैट को समाप्त कर दिया है, ताकि घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखा जा सके।
यह कोई नई घटना नहीं है। 1966 में, मोरक्को के राजा हसन द्वितीय ने भी इसी तरह की अपील की थी, जब देश को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम आर्थिक और सामाजिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।