
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप (सोर्स-सोशल मीडिया)
Strategic Expansion of China Globally: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में चीन अपनी कूटनीतिक चालों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाने में लगा हुआ है। विश्व स्तर पर चीन का रणनीतिक विस्तार की नीति के तहत बीजिंग खुद को सैन्य हस्तक्षेप के बजाय आर्थिक साझेदारी के जरिए एक स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में पेश कर रहा है। यूरोपियन टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि जब वाशिंगटन वेनेजुएला और ईरान जैसे संकटों में उलझा है, तब चीन इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है। यह बदलाव न केवल अवसरवाद है बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मानकों को नया रूप देने का एक सोचा-समझा प्रयास है।
बीजिंग खुद को एक ऐसी शक्ति के रूप में दुनिया के सामने ला रहा है जो सैन्य दखलंदाजी में विश्वास नहीं रखती है। वह आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के निवेश को प्राथमिकता देकर विकासशील देशों के साथ अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है। हालांकि, ताइवान और तिब्बत जैसे आंतरिक मुद्दों पर उसका रुख उसकी इस स्थिरता वाली छवि पर कई सवाल खड़े करता है।
जब अमेरिका वेनेजुएला में मादुरो सरकार और ईरान के घटनाक्रमों को नियंत्रित करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा रहा है, चीन ने वहां पैठ बना ली है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपना प्रभुत्व बचाने की कोशिश कर रहा है जबकि चीन ने वहां बिना किसी राजनीतिक शर्त के निवेश शुरू कर दिया है। यह रणनीतिक अंतराल चीन को वैश्विक मामलों में खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने का मौका दे रहा है।
ईरान चीन की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है और वह इसे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ व्यापार जारी रखकर चीन ने खुद को एक भरोसेमंद और निडर साझेदार के रूप में प्रदर्शित किया है। यह नीति उसे अमेरिका की दंडात्मक कूटनीति की तुलना में अधिक आकर्षक और स्थिर सहयोगी बनाती है।
चीन ने लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों के साथ संबंध सुधारने के लिए चीन-सेलैक मंच का बहुत ही प्रभावी ढंग से उपयोग किया है। यहां वह बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए बिना किसी कठिन राजनीतिक शर्तों के भारी निवेश और ऋण उपलब्ध करा रहा है। इस क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव सीधे तौर पर अमेरिका के पारंपरिक प्रभुत्व को कड़ी चुनौती दे रहा है।
यूरोपियन टाइम्स की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि चीन अमेरिका की तुलना में खुद को अधिक विश्वसनीय साबित करने का प्रयास कर रहा है। वह दंडात्मक नीतियों के बजाय सहयोग की भाषा बोल रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपना स्थान पक्का कर सके। लेकिन मादुरो और ईरान जैसे कट्टरपंथी नेतृत्वों के साथ उसकी नजदीकी उसकी विश्वसनीयता को संदिग्ध बना देती है।
चीन की वर्तमान विस्तारवादी रणनीति इतिहास के उन दौरों की याद दिलाती है जब उभरती शक्तियों ने स्थापित शक्तियों की व्यस्तताओं का लाभ उठाया था। यह केवल वर्तमान संकट का लाभ उठाना नहीं है बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था पर नियंत्रण पाने की एक बड़ी योजना है। दुनिया के कई देश अब चीन की इस रणनीति को विस्तारवाद की आड़ मानकर सतर्क रुख अपना रहे हैं।
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चीन के गैर-हस्तक्षेप के दावे तब खोखले नजर आते हैं जब उसके खुद के संप्रभुता संबंधी दावों की बात आती है। ताइवान और तिब्बत जैसे मामलों में उसका आक्रामक रुख उसके शांतिपूर्ण विकास के दावों के साथ विरोधाभास पैदा करता है। इसके बावजूद, कई देश आर्थिक लाभ की खातिर चीन के साथ अपनी कूटनीतिक साझेदारी को मजबूरी में जारी रखे हुए हैं।






