ट्रंप की 100% टैरिफ धमकी पर चीन का करारा जवाब, कहा-हम नही लेते युद्धों में हिस्सा…
Trump Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन पर 50-100% टैरिफ का सुझाव दिया, जिस पर चीन ने जवाब दिया कि वह युद्ध में नहीं बल्कि शांति वार्ता और बहुपक्षीय सहयोग के जरिए समाधान तलाशने का पक्षधर है।
- Written By: अक्षय साहू
डोनाल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग (फोटो- सोशल मीडिया)
US Tariffs In China: चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान का जवाब दिया है। जिसमें उन्होंने नाटो देशों को चीन पर 50 से 100 फीसदी टैरिफ लगाने का सुझाव दिया था। इसके जवाब में चीन ने कहा है कि वो किसी भी युद्ध में हिस्सा नहीं लेत, वो इसकी जगह शांति वार्ता के जारिए समस्या का हल ढूढंने के पक्ष में है।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने स्लोवेनिया में कहा कि चीन युद्ध में हिस्सा नहीं लेता, बल्कि बातचीत और राजनीतिक समाधान को प्रोत्साहित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा समय में दुनिया में बहुत अराजकता और संघर्ष हैं, इसलिए देशों को मिलकर बहुपक्षवाद (सभी का सहयोग) और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों की रक्षा करनी चाहिए।
चीन और यूरोप को दुश्मन नहीं
वांग यी ने आगे कहा कि चीन और यूरोप को दुश्मन नहीं, बल्कि सहयोगी बनना चाहिए। उनका यह बयान ट्रंप की टैरिफ वाली बात के बाद आया। सदी के सबसे बड़े बदलावों के बीच सही चुनाव करना, इतिहास और लोगों के प्रति दोनों पक्षों की जिम्मेदारियों को दर्शाता है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही मेंअपने सोशल मीडिया अकाउंट ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि, चीन पर इतने बड़े टैरिफ लगाने से रूस पर उसकी पकड़ कमजोर होगी और रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने में मदद मिलेगी। ट्रंप इससे पहले भारत पर 50 फीसदी का टौरिफ लगा चुके हैं।
चीन पर लगाया साजिश रचने का आरोप
इससे पहले ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर अमेरिका के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया था, खासकर SCO मीटिंग और उसके बाद हुए सैन्य परेड के दौरान। जिसमें एशिया का बड़े नेताओं के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन शामिल हुए थे। हालांकि, थोड़ी देर बाद उन्होंने यह भी कहा कि उनके और शी जिनपिंग के व्यक्तिगत रिश्ते “बहुत अच्छे” हैं।
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ट्रंप इससे पहले भी चीन और रूस पर ब्रिक्स के जरिए अमेरिका के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा चुके हैं। ट्रंप का मानना है कि बीजिंग और मॉस्को मिलकर वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की पकड़ कमजोर करना चाहते हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा, जिसे रोकने के लिए कठोर कदम जरूरी हैं।
