Tibet Identity Threat: चीन का नया कानून बना तिब्बत के लिए संकट, मानवाधिकारों का हो रहा घोर उल्लंघन
Tibet Identity Threat: चीन का नया कानून तिब्बत की सांस्कृतिक पहचान खत्म कर रहा है। आईसीटी ने दुनिया से दलाई लामा के साथ बातचीत शुरू करने के लिए चीन पर दबाव डालने की भारी अपील की है।
- Written By: प्रिया सिंह
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के निदेशक रयान फियोरेसी (सोर्स- सोशल मीडिया)
Tibet Identity Threat Crisis: तिब्बत में लगातार मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बहुत तेजी से हो रहा है। चीन एक नए कानून के जरिए तिब्बती लोगों को जबरदस्ती अपनी संस्कृति में ढालने की कोशिश कर रहा है। इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के निदेशक रयान फियोरेसी ने इसे लेकर बहुत गहरी चिंता जताई है। यह नीतियां तिब्बतियों की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान के लिए एक बहुत ही बड़ा खतरा बन चुकी हैं।
चीन ने 1 जुलाई से ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ’ को पूरी तरह से लागू कर दिया है। यह नया कानून ऐसी क्रूर नीतियों को कानूनी मान्यता देता है जिनका मुख्य उद्देश्य तिब्बत की अलग पहचान कमजोर करना है। बीजिंग की यह जबरन एकीकरण नीति तिब्बतियों के मौलिक अधिकारों को बहुत बुरी तरह छीन रही है। दुनिया को अब इसके खिलाफ एकजुट होकर अपनी बहुत ही कड़ी आवाज तत्काल उठानी होगी।
चीनी सरकार का तानाशाही कानून
फियोरेसी ने स्पष्ट किया कि चीन के नए कानून की कई बातें उसके अपने संविधान के सख्त खिलाफ जाती हैं। इसके अलावा यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं का भी एक सीधा और बहुत बड़ा उल्लंघन माना जा रहा है। आईसीटी ने संयुक्त राष्ट्र और कई देशों की सरकारों से इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। चीन इस खतरनाक कानून के जरिए तिब्बती लोगों की आवाज को बहुत बुरी तरह से दबा रहा है।
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दलाई लामा का 91वां जन्मदिन
आईसीटी के निदेशक रयान फियोरेसी ने यह अहम बात वॉशिंगटन में दलाई लामा के 91वें जन्मदिन के मौके पर कही। इस विशेष कार्यक्रम में अमेरिकी सरकारी अधिकारी, राजनयिक और तिब्बती समुदाय के कई लोग मुख्य रूप से शामिल हुए थे। नागरिक समाज के कई प्रतिनिधियों और पत्रकारों ने भी इस महत्वपूर्ण आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सभी ने एकजुट होकर तिब्बत की वर्तमान स्थिति और चीनी नीतियों पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की।
करुणा और अहिंसा का संदेश
फियोरेसी ने जोर देकर कहा कि आज के समय में दुनिया के कई हिस्सों में लगातार भारी संघर्ष चल रहे हैं। ऐसे में दलाई लामा का करुणा और अहिंसा का संदेश पूरी दुनिया के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनका यह संदेश सरल जरूर है लेकिन इसमें देशों के बीच बिगड़े रिश्तों को पूरी तरह बदलने की भारी ताकत है। शांति के रास्ते पर चलकर ही ऐसे पुराने और जटिल विवादों को सही तरीके से सुलझाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव की बड़ी जरूरत
आईसीटी ने अमेरिका सहित सभी देशों की सरकारों से चीन पर कड़ा अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की बहुत भारी अपील की है। संगठन का दृढ़ मानना है कि चीन को दलाई लामा या उनके विशेष प्रतिनिधियों के साथ बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए। तिब्बत के इस गंभीर मुद्दे का स्थायी समाधान केवल शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए ही पूरी तरह निकाला जा सकता है। इस अहम बातचीत में तिब्बती लोगों की वर्तमान चिंताएं बहुत ही प्रमुखता से शामिल होनी चाहिए।
वास्तविक स्वायत्तता और मूल अधिकार
इस बातचीत में तिब्बती लोगों की लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को मुख्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उन्हें अपने क्षेत्र में वास्तविक स्वायत्तता और सभी बुनियादी मूल अधिकार मिलने बहुत ही ज्यादा जरूरी हैं। दलाई लामा साल 1959 में अपना देश तिब्बत छोड़कर भारत आ गए थे और तब से धर्मशाला में रह रहे हैं। उन्हें 1989 में शांतिपूर्ण तरीके से समाधान खोजने के लिए विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार मिला था।
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अमेरिका का तिब्बत नीति कानून
अमेरिका ने साल 2002 के तिब्बत नीति कानून के तहत तिब्बत मामलों के लिए एक विशेष समन्वयक का अहम पद बनाया था। यह खास कार्यालय तिब्बत को लेकर सभी अमेरिकी नीतियों में एक बहुत ही बेहतर तालमेल स्थापित करता है। यह चीनी अधिकारियों और तिब्बती प्रतिनिधियों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने का काम भी बहुत ही जिम्मेदारी से करता है। यह तिब्बतियों को उनके अधिकार दिलाने और शांति स्थापित करने की एक बहुत बड़ी और सकारात्मक पहल है।
