शेख हसीना के इस्तीफे के बारे में बोलना राष्ट्रपति शहाबुद्दीन काे पड़ा भारी, अब लटक रही तलवार
बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे को लेकर बोलना भारी पड़ गया। अब खुद उनके ऊपर तलवार लटक रही है और उनसे इस्तीफे की मांग की जा रही है।
- Written By: साक्षी सिंह
शेख हसीना Pic: Social Media
ढाका: बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे को लेकर बोलना भारी पड़ गया। अब खुद उनके ऊपर तलवार लटक रही है और उनसे इस्तीफे की मांग की जा रही है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने गुरुवार को कहा कि वह राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के भाग्य का फैसला करेगी। यह फैसला राष्ट्रपति के उस बयान पर उठे विवाद के बीच लिया गया है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री पद से शेख हसीना के इस्तीफे पर सवाल उठाए थे।
अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के एक सलाहकार के मुताबिक, सलाहकार परिषद ने राष्ट्रपति शहाबुद्दीन के भाग्य पर राजनीतिक दलों के साथ चर्चा करने का निर्णय लिया है। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मामलों की सलाहकार सईदा रेजवाना हसन के हवाले से बांग्ला भाषा के अखबार प्रथम आलो ने कहा कि परिषद राजनीतिक दलों की आम सहमति के आधार पर निर्णय लेगी।
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राष्ट्रपति ने क्या दिया था बयान
राष्ट्रपति को हटाने का मुद्दा तब उठा जब कुछ दिन पहले शहाबुद्दीन ने एक बांग्ला अखबार से कहा था कि उन्हें हसीना का इस्तीफा पत्र नहीं मिला है। बांग्ला दैनिक ‘मनोबजमीन’ को दिए साक्षात्कार में शहाबुद्दीन ने कहा कि उन्होंने सुना है कि हसीना ने बांग्लादेश छोड़ने से पहले प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उनके पास कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है।
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन के इस्तीफे की मांग
राष्ट्रपति ने कहा कि कई प्रयासों के बावजूद उन्हें कोई भी दस्तावेज नहीं मिल पाया। शहाबुद्दीन ने कहा कि शायद उनके पास समय नहीं था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हसीना के सत्ता से बेदखल होने और संसद भंग होने के बाद मौजूदा हालात के बीच राष्ट्रपति के बयान का कोई खास महत्व नहीं है। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने मंगलवार को राष्ट्रपति भवन पर धावा बोलने की कोशिश की और राष्ट्रपति शहाबुद्दीन के बयानों के लिए उनके इस्तीफे की मांग की।
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सेना ने स्थिति को संभाला
कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा। भेदभाव विरोधी छात्र आंदोलन ने हसीना के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार को अपदस्थ करने के लिए बड़े पैमाने पर विद्रोह का नेतृत्व किया था। इसने मंगलवार को शहाबुद्दीन को सात दिनों में पद से हटाने के लिए समय सीमा तय की। साथ ही पांच सूत्री मांग रखी, जिसमें पहली मांग बांग्लादेश के 1972 के संविधान को रद्द करने की है।
