Bangladesh चुनाव और धर्म का राजनीतिकरण, क्या कट्टरपंथ की राह पर है पड़ोसी देश?
Bangladesh Election Crisis: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनावों के बीच धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक के लिए किया जा रहा है। कट्टरपंथ के कारण अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों पर खतरा मंडरा है।
- Written By: प्रिया सिंह
बांग्लादेश चुनाव (सोर्स-सोशल मीडिया)
Religious Politics In Bangladesh Elections: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले वहां का राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण और जटिल हो गया है। वहां की कुछ राजनीतिक पार्टियां वोट पाने के लिए धर्म का सहारा ले रही हैं और विरोधियों को खुलेआम धर्म-विरोधी बता रही हैं। धार्मिक कट्टरता के बढ़ने से मजारों पर हमले, संगीत पर प्रतिबंध और रंगमंच को धमकियां मिलने की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। यह स्थिति न केवल वहां के अल्पसंख्यकों के लिए बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी जड़ों के लिए भी एक गंभीर संकट पैदा कर रही है।
धर्म का राजनीतिकरण
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव प्रचार के दौरान कई दल खुलेआम दावा कर रहे हैं कि उनके खिलाफ वोट देना सीधे तौर पर इस्लाम के खिलाफ है। यह एक पुरानी रणनीति है जिसके तहत राजनीतिक विरोधियों की वैधता खत्म करने के लिए उन्हें धर्म-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाता है। पूरे देश में संगीत शिक्षा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में मनमाने बदलावों के जरिए एक विशेष कट्टरपंथी विचारधारा को थोपने की कोशिश की जा रही है।
अल्पसंख्यकों पर बढ़ता संकट
स्तंभकार हसन फिरदौस का कहना है कि सत्ता पाने के लिए धर्म का इस्तेमाल हमेशा से ही आम जनता के लिए दमनकारी और खतरनाक रहा है। आज कई पार्टियों के नाम में ही धर्म शामिल है, जिससे उनकी सांप्रदायिक पहचान एकदम साफ हो जाती है और आम जनता के मन में संदेह पैदा होता है। फेसबुक की किसी टिप्पणी या पोस्ट के आधार पर अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
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महिलाओं के अधिकारों पर हमला
एक प्रमुख राजनीतिक दल ने अजीबोगरीब प्रस्ताव दिया है कि महिलाओं के काम के घंटों को घटाकर प्रतिदिन केवल पांच घंटे तक ही सीमित कर दिया जाए। इस दीर्घकालिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक प्रतिस्पर्धा से बाहर कर उन्हें घर की चारदीवारी के भीतर कैद करना बताया जा रहा है। यह कदम महिलाओं की प्रगति में एक बड़ी बाधा बन सकता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से पूरी तरह अलग-थलग करने की कोशिश है।
शरिया और चुनावी विरोधाभास
कट्टरपंथी दल जमात-ए-इस्लामी सार्वजनिक रूप से कहता है कि वह शरिया लागू नहीं करेगा, लेकिन उसके नेता टेलीविजन टॉक शो में इसकी खुलकर वकालत करते हैं। जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ता अपने चुनाव चिह्न ‘तराजू’ को वोट देने को एक धार्मिक कर्तव्य और स्वर्ग या जन्नत पाने का पक्का टिकट बता रहे हैं। यह स्पष्ट विरोधाभास दिखाता है कि सत्ता में आने के लिए वे धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कर मासूम मतदाताओं को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
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भविष्य की गहरी अनिश्चितता
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति का उदाहरण देते हुए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि धर्म आधारित राजनीति पूरे समाज को गहराई से बांट सकती है। वर्तमान स्थिति में सांस्कृतिक गतिविधियों पर पाबंदी और कट्टरपंथ का बढ़ता प्रभाव बांग्लादेश की उदार और लोकतांत्रिक पहचान के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। आगामी चुनाव के परिणाम यह तय करेंगे कि देश आधुनिकता के पथ पर आगे बढ़ेगा या फिर पुरानी कट्टरपंथी विचारधारा की ओर वापस मुड़ जाएगा।
