मौत के कई हफ्तों बाद भी क्यों नहीं दफनाए गए अयातुल्ला खामेनेई? ईरान की मजबूरी या इजरायल का खौफ!
Ayatollah Khamenei Funeral: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के कई हफ्ते बीत जाने के बावजूद उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया है। आखिर किन कारणों से ईरान को ये फैसला टालना पड़ा।
- Written By: अमन उपाध्याय
अयातुल्ला अली खामेनेई, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Ayatollah Khamenei Funeral Delay News In Hindi: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को करीब दो महिने होने जा रहे हैं लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, अब तक उन्हें सुपुर्दे-खाक नहीं किया गया है। 86 वर्षीय खामेनेई 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के एक संयुक्त हवाई हमले में मारे गए थे, जिसके बाद से पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर है। हालांकि, इतने लंबे समय के बाद भी उनके अंतिम संस्कार को लेकर कोई आधिकारिक तारीख सामने न आना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
आखिर क्या है कारण?
न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के हवाले से यह जानकारी सामने आई है कि ईरानी अधिकारी खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर बेहद डरे हुए हैं। अधिकारियों का मानना है कि यदि तेहरान में कोई बड़ा सार्वजनिक आयोजन किया जाता है, तो वह इजरायली मिसाइलों और हवाई हमलों के लिए एक आसान लक्ष्य बन सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार बड़े स्तर पर होने वाली जनसभाओं के दौरान सुरक्षा जोखिमों का आकलन कर रही है क्योंकि इजरायल ने पहले ही ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।
रद्द हुई पुरानी योजनाएं
ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, शुरुआत में 4 मार्च से तीन दिनों के राजकीय शोक और अंतिम संस्कार की योजना बनाई गई थी। लेकिन ठीक उसी समय अमेरिका-इजरायल के हमले तेज हो गए, जिसके कारण इस योजना को आनन-फानन में रद्द करना पड़ा। अब खबरें आ रही हैं कि ईरानी अधिकारी मशहद शहर को अंतिम विदाई के लिए संभावित स्थान के रूप में देख रहे हैं। माना जा रहा है कि तेहरान की तुलना में मशहद में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना अधिक आसान होगा।
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सरकार को बाहरी हमलों का डर
फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के विशेषज्ञ बेहनम तालेब्लू का कहना है कि वर्तमान ईरानी शासन इस समय खुद को बेहद असुरक्षित और कमजोर महसूस कर रहा है। सरकार को न केवल बाहरी हमलों का डर है बल्कि उसे आंतरिक असंतोष और जनसभाओं के दौरान होने वाली संभावित अशांति की भी चिंता सता रही है। सीधे शब्दों में कहें तो शासन इस समय इतना डरा हुआ है कि वह किसी भी प्रकार का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है।
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1989 के मुकाबले बदले हालात
यह स्थिति 1989 के ठीक उलट है, जब ईरान के पिछले सर्वोच्च नेता आयतुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का निधन हुआ था। उस समय तेहरान की सड़कों पर लाखों लोग उमड़े थे और एक ऐतिहासिक स्टेट फ़्यूनरल का आयोजन किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई की मौत के बाद वैसी जनभागीदारी देखने को नहीं मिली है, जिसका एक बड़ा कारण लगातार हो रहे हवाई हमले और देश में व्याप्त अस्थिरता है। फिलहाल, ईरान सीजफायर और शांति वार्ताओं के बीच अपने सर्वोच्च नेता को अंतिम विदाई देने के लिए सही समय का इंतजार कर रहा है।
