Explainer: ममता बनर्जी की टूटती पार्टी के बीच बड़ा सवाल, किसे मिलेंगे TMC के 219.3538 करोड़ रुपये?
TMC Financial Assets: पिछले साल तृणमूल को डोनेशन के तौर पर 184.08 करोड़ रुपये मिले थे, जो सभी रीजनल पार्टियों में सबसे ज्यादा था। फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज के तौर पर और 33.685 करोड़ रुपये की कमाई हुई।
- Written By: मनोज आर्या
टीएमसी के पैसे पर किसका हक? (AI जेनरेटेड इमेज)
TMC Financial Assets: पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे तृणमूल कांग्रेस टूटती जा रही है, वहां ममता बनर्जी के लिए सिर्फ पॉलिटिकल कैपिटल ही दांव पर नहीं है जो उन्होंने चार दशकों में में बनाया है। बल्कि वह कैपिटल भी कानूनी दांव-पेंच में है जिसे आर्थिक दुनिया जानती है। पार्टी, उसके सिंबल और सबसे जरूरी बंगाल में 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी ने जो पूंजी जमा किए हैं। अब उन पर भी सवालिया निशान मंडरा रहा है।
2024-25 वित्त वर्ष के लिए तृणमूल कांग्रेस ने 13 अक्टूबर, 2025 को फाइल किए गए अपने इनकम-टैक्स रिटर्न में कुल कमाई 219.3538 करोड़ रुपये बताई थी। इस साल 27 मई को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक रिपोर्ट में संगठन द्वारा विश्लेषण की गई 36 क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पार्टियों में तेलुगु देशम पार्टी के बाद तृणमूल दूसरे नंबर पर थी।
पिछले साल डोनेशन से मिले 184.08 करोड़
पिछले साल तृणमूल को डोनेशन के तौर पर 184.08 करोड़ रुपये मिले थे, जो सभी रीजनल पार्टियों में सबसे ज्यादा था। फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज के तौर पर और 33.685 करोड़ रुपये की कमाई हुई। 2023-24 वित्त वर्ष में टीएमसी ने 646.293 करोड़ रुपये कमाए थे। जब तक सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को गैर-कानूनी घोषित नहीं किया, तब तक ममता बनर्जी की पार्टी ने अप्रैल 2019 और जनवरी 2024 के बीच 1,609.5 करोड़ रुपये कैश किए थे, जो सभी राजनीतिक पार्टियों में दूसरी सबसे बड़ी रकम पाने वाली पार्टी थी।
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द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, ममता के एक वफादार तृणमूल विधायक ने बताया कि यह इन मुद्दों पर बात करने का समय नहीं है। सब कुछ बदल रहा है। यह सच है कि उनके (बागी विधायकों और सांसदों) के संख्या बल है।। लेकिन मुझे नहीं लगता कि बागियों को भी ठीक से पता है कि उनका अगला कदम क्या होगा।
ऋतब्रत बनर्जी के साथ 56 TMC विधायक
बंगाल विधानसभा में संख्या बल स्पष्ट हैं। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में जीतने वाले 80 तृणमूल विधायकों में से दो को निकाल दिया गया और 56 अन्य ने विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए निकाले गए तृणमूल विधयाक ऋतब्रत बनर्जी को समर्थन दिया है। संसद में तृणमूल टूट रही है। राज्यसभा में जहां तृणमूल के 13 सांसद थे, पार्टी ने तीन सांसद खो दिए हैं और अब यह संख्या 10 हो गई है। गुरुवार को सुखेंदु शेखर रे और सुष्मिता देव के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रकाश चिक बड़ाइक ने भी इस्तीफा दे दिया।
अब तक सामने आ रही जानकारी के मुताबिक, तृणमूल के 28 में से 19 लोकसभा पार्टी से अलग होकर एक अलग ग्रुप बना चुके हैं। कलकत्ता और दिल्ली में दो बागी ग्रुप के नेताओं ऋतब्रत बनर्जी और काकोली घोष दस्तीदार की ओर से आगे की रणनीति पर कोई भी जानकारी सामने नहीं है।
इंदिरा गांधी के रास्ते पर चलीं ममता बनर्जी
अपने सियासी सफर में दो बार, 1969 और 1978 में इंदिरा गांधी उसी रास्ते पर चलीं थी, जिस पर आज ममता बनर्जी हैं। 1969 में कांग्रेस के कांग्रेस (O) और इंडियन नेशनल कांग्रेस में बंट जाने के बाद (बाद वाली इंदिरा के नेतृत्व में थी), 1952 और 1969 के बीच हुए चुनावों में पार्टी द्वारा इस्तेमाल किया गया दो बैलों का चुनाव चिन्ह, जो एक जुआठ को ढो रहे थे, कांग्रेस (O) के पास चला गया।
एक सीनियर कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्होंने न केवल चुनाव चिह्न खो दिया, बल्कि 7 जंतर मंतर रोड पर ऑफिस, लाइब्रेरी और दूसरी संपत्तियां भी खो दीं। बछड़े और गाय का नया चुनाव चिह्न मिलने के बाद इंदिरा ने 1971 के चुनावों में शानदार जीत के साथ वापसी की।
1978 में पार्टी से निकाली गई थीं इंदिरा
1 जनवरी, 1978 को कासु ब्रह्मानंद रेड्डी ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया, जो इंदिरा कैबिनेट में केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में काम कर रहे थे। वही व्यक्ति थे जिन्होंने चार साल बाद इमरजेंसी की घोषणा का ड्राफ्ट तैयार किया और उस पर साइन किए थे। रेड्डी ने चुनाव आयोग को लिखा कि मैं कानूनी और संवैधानिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष हूं और अगर ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ नाम से कोई संगठन बनाया जाता है तो वह गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक है।
जब इंदिरा गांधी से छीन गया था सिंबल
बंगाल के एक कांग्रेस लीडर (जिनकी अब मौत हो चुकी है) ने तब कहा था कि हम अब इंदिरा गांधी का बोझ नहीं उठा सकते हैं। कांग्रेस में इंदिरा के वफादारों ने देश भर से लगभग 700 AICC सदस्यों के हस्ताक्षर इकट्ठा किए। नई दिल्ली के मावलंकर हॉल में एक कन्वेंशन हुआ जहां इंदिरा ने अपनी नई पार्टी की घोषणा की। नई पार्टी की कीमत लोकसभा में 153 सांसदों में से 76 का सपोर्ट खोना था। रेड्डी के ग्रुप के एतराज पर चुनाव आयोग ने ‘गाय और बछड़ा’ सिंबल फ्रीज कर दिया, जिससे इंदिरा गांधी के पास पार्टी का सिंबल नहीं रहा।
सिंबल के लिए EC तक नहीं पहुंचा बागी गुट
तृणमूल से अलग हुए किसी भी ग्रुप ने अभी तक सिंबल को लेकर इलेक्शन कमीशन से संपर्क नहीं किया है। इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन और अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 इलेक्शन कमीशन को किसी पॉलिटिकल पार्टी में फूट पड़ने पर दुश्मन गुटों के दावों पर फैसला करने का अधिकार देता है। पूर्वी कोलकाता में ईस्टर्न मेट्रोपॉलिटन बाईपास के पास तोप्सिया में तृणमूल का पुराना ऑफिस में रेनोवेशन का काम चल रहा है। फिलहाल कैनाल साउथ रोड पर तृणमूल का अस्थाई ऑफिस तीन साल पहले किराए पर लिया गया था। इस बिल्डिंग के मालिक ने टीएमसी से जगह खाली करने को कहा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए ऋतब्रत बनर्जी के नाम का समर्थन पत्र स्पीकर को सौंपते टीएमसी के बागी विधायक।
तृणमूल के टूटने के बाद अब तक एकमात्र कानूनी चुनौती सोभनदेब चट्टोपाध्याय ने दी है, जो 294 सदस्यों वाली बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर ममता की पसंद थे। चट्टोपाध्याय ने बागी गुट के ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के फैसले को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
बिना मर्जर दलबदल का नियम क्या है?
संविधान का दसवां शेड्यूल, जिसे एंटी-डिफेक्शन लॉ भी कहा जाता है। यह कानून कहता है कि किसी सदस्य को दलबदल के आधार पर अयोग्य ठहराना किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में मर्जर के मामले में लागू नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट में सीनियर वकील और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि दसवें शेड्यूल की भावना खत्म हो चुकी है।
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तन्खा ने कहा कि संसदीय या विधायक दल में फूट को असली पार्टी में फूट माना जा रहा है। हमने गोवा, महाराष्ट्र और कुछ दूसरे राज्यों में ऐसा देखा है। जब महाराष्ट्र का मामला (शिवसेना और NCP में फूट) आया, अगर सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिन ही ऑर्डर पर रोक लगा दी होती तो महाराष्ट्र की तस्वीर कुछ और होती। कुछ फैसलों ने राजनीति में नैतिक मूल्यों को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
