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बंगाल में बीजेपी की राह आसान करेंगे मुस्लिम! 90 सीटों पर ममता बनर्जी को मिल सकती है मात
- Written By: रंजन कुमार
Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। सीएम ममता बनर्जी के महिला केंद्रित सामाजिक मॉडल की अग्निपरीक्षा, टीएमसी बनाम बीजेपी की लड़ाई चर्चा में है।

पीएम मोदी और ममता बनर्जी।
West Bengal Election Updates: पश्चिम बंगला विधानसभा चुनाव की चर्चाएं देशभर में हो रही हैं। चुनाव थोड़ा दूर है, लेकिन राजनीति के पहिए तेज रफ्तार से घूम रहे हैं। यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के उस सामाजिक मॉडल की अग्निपरीक्षा है, जिसने एक दशक से अधिक समय तक प्रदेश की राजनीति को दिशा दी। मार्च-अप्रैल में संभावित चुनाव और 7 मई को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के साथ राज्य की राजनीति दो स्पष्ट ध्रुवों-टीएमसी और बीजेपी में सिमटती जा रही है।
ममता बनर्जी की राजनीति का सबसे स्थायी आधार महिलाएं हैं। इसका कारण लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपश्री, आनंदधारा और सबला आदि योजना हैं। इन योजनाओं ने सरकार और महिला मतदाता के बीच मजबूत संबंध बनाया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के करीब बराबर रही थी। यह वह सामाजिक सच्चाई है, जिसने ममता को लगातार बढ़त दिलाई। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं अब कल्याण नहीं, बल्कि चुनावी सुरक्षा कवच हैं। बंगाल में आज चुनावी गणित नहीं, महिला मनोविज्ञान सत्ता तय कर रहा है। यही वजह है कि चुनाव से पहले महिलाओं के लिए नई या संशोधित योजना की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नीतीश कुमार मॉडल का बंगाल संस्करण
महिला सशक्तीकरण के माध्यम से सत्ता का सामाजिक आधार मजबूत करने की यह रणनीति बिहार में नीतीश कुमार द्वारा अपनाई गई थी। जीविका दीदियां, आरक्षण, छात्रवृत्ति ने बिहार की सत्ता को स्थायित्व दिया। बंगाल में सीएम ममता बनर्जी ने इसी मॉडल को बंगाल की जरूरतों के मुताबिक ढालते हुए आधी आबादी को अपना कोर वोट बैंक बनाया।
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भाजपा के पास मजबूत नैरेटिव, पर कमजोर स्थानीय चेहरा
2021 में बीजेपी ने 77 सीटें जीतकर साफ कर दिया था कि बंगाल एकतरफा मैदान नहीं रहा। पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, हिंदुत्व का एजेंडा, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और एसआईआर जैसे मुद्दों ने बीजेपी को वैचारिक ऊर्जा दी है। हाल के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से बीजेपी का आत्मविश्वास और बढ़ा है। मगर, बीजेपी की चुनौती है कि बंगाल में उसका चेहरा अब भी राष्ट्रीय है। कोई स्थानीय नहीं। यह अंतर चुनावी मोड़ पर निर्णायक बन सकता है।
अल्पसंख्यक वोटरों में असंतोष
अल्पसंख्यक राजनीति में ममता की स्थिति अब सहज नहीं रही। वक्फ कानून पर बदला रुख, एसआईआर को लेकर असहजता और पार्टी में से उठती आवाजों ने मुस्लिम मतदाताओं के मन में सवाल उठाए हैं। यह पहली बार है, जब मुस्लिम वोटर ममता को अनिवार्य विकल्प के बजाय एक विकल्प के तौर पर देखने लगा है। 90 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला यह वोट बैंक बंटा तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।
सबसे संवेदनशील मोर्चा SIR
गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) ने टीएमसी को सबसे ज्यादा परेशान किया है। सीमावर्ती जिलों में घुसपैठ का सवाल नया नहीं है, पर इस पर बदला हुआ राजनीतिक रुख ममता के लिए चुनौती बन गया है। चुनाव आयोग का आगे बढ़ना इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में होगा।
Muslims will make the bjp path easier in bengal mamata banerjee could be defeated in 90 seats
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