फोटो सोर्स- टीएमसी 'एक्स'
Mamata Banerjee at Supreme Court: बंगाल चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर है। आज मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी सांसदों की याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इस सुनवाई की सबसे बड़ी चर्चा ममता बनर्जी का खुद अपनी दलीलें पेश करने की संभावना को लेकर है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को एक नए अवतार में नजर आ सकती हैं। बंगाल में वोटर लिस्ट के एसआईआर के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी खुद एक वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित रह सकती हैं। चूंकि मुख्यमंत्री ने खुद कानून की पढ़ाई की है, इसलिए टीएमसी सूत्रों का मानना है कि वे अपनी दलीलें खुद पेश कर इस मुद्दे की गंभीरता को अदालत के सामने रखना चाहती हैं।
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की एक उच्चस्तरीय पीठ करेगी, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे हैं। इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं। ममता बनर्जी के अलावा, टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन और मोस्तारी बानो ने भी इस प्रक्रिया के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं, जिन पर अदालत आज विस्तार से विचार करेगी।
इस पूरे कानूनी विवाद के केंद्र में वोटर लिस्ट का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी SIR है। सूत्रों के अनुसार, राज्य में लगभग 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में डाल दिए गए हैं। यह विसंगतियां मुख्य रूप से 2002 की मतदाता सूची के साथ वर्तमान आंकड़ों के मिलान के दौरान सामने आई हैं।
इन विसंगतियों के कुछ तकनीकी उदाहरण इस प्रकार हैं:
• मतदाता और उसके माता-पिता की उम्र के बीच का अंतर 15 वर्ष से कम पाया जाना।
• माता-पिता और बच्चे की उम्र में 50 साल से ज्यादा का अंतर होना।
• माता-पिता के नाम की स्पेलिंग या अन्य पहचान संबंधी विसंगतियां।
ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का आरोप है कि इन विसंगतियों के आधार पर बड़ी संख्या में असली वोटर्स के नाम काटे जा सकते हैं जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।
मुख्यमंत्री ने 28 जनवरी को अपनी याचिका दायर की थी, जिसमें निर्वाचन आयोग और बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है। इससे पहले उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर इस पूरी प्रक्रिया को ‘मनमाना’ और ‘खामियों से भरा’ बताया था। ममता बनर्जी का तर्क है कि यदि मौजूदा स्वरूप में SIR की प्रक्रिया जारी रही, तो बड़ी संख्या में लोग अपने मताधिकार से वंचित हो जाएंगे, जो सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों पर प्रहार होगा।
People’s Advocate Vs Devil’s Advocate. pic.twitter.com/D9PUyjkeDY — All India Trinamool Congress (@AITCofficial) February 3, 2026
वहीं, टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग लिखित आदेश देने के बजाय अनौपचारिक माध्यमों से निर्देश जारी कर रहा है, जो प्रक्रियागत खामियों को दर्शाता है। टीएमसी की मांग है कि जब तक सभी दावों और आपत्तियों का पूरी तरह निपटारा न हो जाए, तब तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए।
इससे पहले 19 जनवरी को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को लेकर कुछ कड़े निर्देश जारी किए थे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि SIR की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए ताकि आम लोगों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में हैं, उनकी सूची ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में प्रदर्शित की जाए ताकि लोग अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकें।
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आज की सुनवाई इस मायने में अहम है कि अदालत ममता बनर्जी की दलीलों और चुनाव आयोग के जवाब के बाद क्या रुख अपनाती है। यदि ममता बनर्जी खुद जिरह करती हैं, तो यह भारतीय न्यायिक इतिहास और राजनीति के लिहाज से एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण घटना होगी। बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मद्देनजर यह मामला राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है।