अलकनंदा झील में बोट।
Uttarakhand Boat Accident Video : उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित प्रसिद्ध धारी देवी मंदिर के पास अलकनंदा झील में एक रोंगटे खड़े कर देने वाला हादसा सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने जल क्रीड़ा के दौरान बरती जा रही लापरवाही और सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है।
वीडियो में दो मोटर बोट्स के बीच हुई जोरदार टक्कर को देखकर किसी का भी दिल दहल सकता है। गनीमत यह रही कि हादसे के वक्त दोनों बोट्स पर केवल चालक ही सवार थे, वरना यह एक बड़ी त्रासदी में बदल सकता था।
वायरल वीडियो की तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि अलकनंदा की लहरों पर दो नावें काफी तेज रफ्तार में दौड़ रही हैं। अचानक आगे चल रही बोट ने एक मोड़ लिया, लेकिन ठीक उसके पीछे आ रही बोट का चालक अपनी रफ्तार पर नियंत्रण नहीं रख सका। देखते ही देखते पीछे वाली बोट उछलकर आगे वाली बोट के ऊपर से निकल गई। यह दृश्य इतना खौफनाक था कि नदी किनारे खड़े लोग चीख पड़े। यदि इन बोट्स पर पर्यटक सवार होते, तो जान-माल का भारी नुकसान तय था।
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और मंदिर समिति का गुस्सा एक बार फिर भड़क उठा है। दरअसल, धारी देवी मंदिर की पवित्रता और शांति को लेकर ग्रामीण लंबे समय से यहां बोट संचालन का विरोध कर रहे हैं। मंदिर समिति के अनुसार बोट्स के शोर-शराबे से पूजा-पाठ में व्यवधान पड़ता है और अब तक प्रशासन को 200 से अधिक शिकायतें भेजी जा चुकी हैं। हैरानी की बात यह है कि इन तमाम विरोधों के बावजूद श्रीनगर नगर निगम यहां बोट्स का व्यावसायिक संचालन जारी रखे हुए था।
उत्तराखंड के प्रसिद्ध सिद्धपीठ धारी देवी मंदिर के पास अलकनंदा नदी में दिल दहला देने वाला हादसा! 😳
दो बोटों की आमने-सामने जोरदार टक्कर हुई…
टक्कर इतनी भयंकर थी कि एक बोट दूसरी के ऊपर चढ़ गई, और एक व्यक्ति सीधे उफनती नदी में जा गिरा! 🌊
लापरवाही या किस्मत का खेल?#Uttarakhand pic.twitter.com/zq07Unb7ZB — Yashwant singh Sainthwar (Kshatriya) (@GkpYashwant) February 20, 2026
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हादसे के बाद अब प्रशासन की नींद टूटी है। श्रीनगर नगर निगम के सहायक नगर आयुक्त रविराज बंगारी ने संकेत दिए हैं कि अब बोट संचालन की जगह को मंदिर परिसर से दूर शिफ्ट करने पर विचार किया जा रहा है। बता दें कि धारी देवी मंदिर अलकनंदा नदी के तट पर झील के बीचों-बीच स्थित है और गढ़वाल क्षेत्र की रक्षक देवी के रूप में पूजनीय है। श्रद्धालुओं का मानना है कि आस्था के ऐसे केंद्रों पर व्यावसायिक गतिविधियों के बजाय सुरक्षा और मर्यादा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रशासन की इस देरी और लापरवाही पर अब सवाल उठ रहे हैं।