Varanasi: तीन किलोमीटर पहले रोका गया मीडिया, पास वितरण पर सवाल; सीसीटीवी बंद होने के आरोप से घिरा प्रशासन

Varanasi News: कार्यक्रम स्थल से तीन किलोमीटर पहले पत्रकारों को रोकने,प्रवेश पास नहीं मिलने के आरोपों से जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। वहीं, स्ट्रांगरूम का CCTV कैमरा बंद होने सवाल उठ रहे।
Varanasi Administration Under Scrutiny Over Media Entry Passes and Strongroom CCTV Allegations
सपा नेता(सोर्स-नवभारत लाइव)
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Varanasi Media Entry Pass Controversy: वाराणसी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मीडिया के प्रवेश और पास वितरण की प्रक्रिया को लेकर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कुछ पत्रकारों को प्रवेश पास नहीं दिया गया, वहीं मीडिया कर्मियों को कार्यक्रम स्थल से करीब तीन किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया। इससे पत्रकारों को कार्यक्रम की कवरेज करने में परेशानी का सामना करना पड़ा।

दूसरी ओर, विपक्ष की ओर से स्ट्रांगरूम का सीसीटीवी कैमरा बंद होने को लेकर लगाए गए आरोपों ने भी प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि रात में अधिकारियों की मौजूदगी के दौरान कैमरा बंद हुआ था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मीडिया को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने से रोका गया और पास वितरण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जा रही है?

Varanasi Administration Under Scrutiny Over Media Entry Passes and Strongroom CCTV Allegations
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तीन किलोमीटर पहले मीडिया को रोकने पर सवाल

कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंचे पत्रकारों को कार्यक्रम स्थल से लगभग तीन किलोमीटर पहले रोकने का मामला सामने आया है। पत्रकारों के बीच इस बात को लेकर नाराजगी है कि जब कार्यक्रम में मीडिया कवरेज की व्यवस्था की गई थी, तो सभी संबंधित पत्रकारों के लिए प्रवेश की स्पष्ट व्यवस्था क्यों नहीं सुनिश्चित की गई? यदि सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध लगाए गए थे, तो मीडिया के आवागमन और कवरेज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं स्पष्ट की गई?

पत्रकारों का कहना है कि मीडिया को प्रवेश पास नहीं मिलने और कार्यक्रम स्थल से काफी पहले रोक दिए जाने के कारण कवरेज प्रभावित हुई। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मीडिया के लिए पास जारी करने के क्या मानक थे और किन आधारों पर कुछ पत्रकारों को प्रवेश की अनुमति मिली, जबकि अन्य इससे वंचित रह गए।

जिला सूचना विभाग की भूमिका पर उठे सवाल

पास वितरण को लेकर जिला सूचना विभाग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि कुछ चिह्नित लोगों को प्रवेश पास जारी किए गए, जबकि वाराणसी के कुछ पत्रकारों को पास नहीं मिला। इस मामले में जिला सूचना अधिकारी एसएन पाल की ओर से कथित तौर पर यह हवाला दिया गया कि पास आयोग की ओर से आए हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि पास संबंधित आयोग की ओर से जारी किए गए थे, तो जिला सूचना विभाग की भूमिका क्या थी? क्या विभाग को केवल प्राप्त पास का वितरण करना था या फिर पात्र लोगों के चयन की जिम्मेदारी भी विभागीय स्तर पर तय की गई थी? यदि पास सीमित संख्या में उपलब्ध थे, तो उनके वितरण के लिए कौन-से मानक अपनाए गए?

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पत्रकारों का सवाल है कि पास वितरण की प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं रखी गई और सभी संबंधित पत्रकारों को इसकी स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी गई। इस संबंध में जिला सूचना विभाग और संबंधित आयोग की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।

सीसीटीवी बंद होने के आरोप से भी उठे सवाल

दूसरी ओर, विपक्ष की ओर से स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे बंद होने को लेकर लगाए गए आरोपों ने भी प्रशासनिक पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है। विपक्ष का आरोप है कि रात में अधिकारियों की मौजूदगी के दौरान स्ट्रांगरूम का कैमरा बंद हुआ था। इस मामले में सीसीटीवी बंद रहने की अवधि, उसके कारण और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

यदि कैमरा बंद हुआ था, तो इसकी वजह क्या थी? क्या तकनीकी खराबी के कारण ऐसा हुआ या इसके पीछे कोई अन्य कारण था? कैमरा कितनी देर तक बंद रहा और उस दौरान निगरानी की वैकल्पिक व्यवस्था क्या थी? इन सवालों पर प्रशासन की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।

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हालांकि, सीसीटीवी बंद होने के आरोपों और पास वितरण में कथित पक्षपात की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड और अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। ऐसे में बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

जवाबदेही तय करने की मांग

एक तरफ मीडिया कर्मियों को कार्यक्रम स्थल से करीब तीन किलोमीटर पहले रोके जाने और कुछ पत्रकारों को प्रवेश पास नहीं मिलने के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे बंद होने को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। इन अलग-अलग मामलों में उठ रहे सवालों के बीच जिला प्रशासन की जवाबदेही और पारदर्शिता पर चर्चा तेज हो गई है।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि मीडिया के लिए प्रवेश पास जारी करने और उनके वितरण की जिम्मेदारी किसकी थी। साथ ही, स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे से जुड़े आरोपों पर भी तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि किसी तरह की आशंका या भ्रम की स्थिति न रहे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मीडिया को प्रवेश से वंचित रखने की वजह क्या थी और पास वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता के मानकों का कितना पालन हुआ? वहीं, स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे बंद होने के आरोपों पर प्रशासन क्या जवाब देगा? इन सवालों पर जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों का स्पष्ट पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति साफ हो सकेगी। हालांकि, सीसीटीवी बंद होने के आरोपों और पास वितरण में कथित पक्षपात की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड और अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। ऐसे में बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

जवाबदेही तय करने की मांग

एक तरफ मीडिया कर्मियों को कार्यक्रम स्थल से करीब तीन किलोमीटर पहले रोके जाने और कुछ पत्रकारों को प्रवेश पास नहीं मिलने के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे बंद होने को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। इन अलग-अलग मामलों में उठ रहे सवालों के बीच जिला प्रशासन की जवाबदेही और पारदर्शिता पर चर्चा तेज हो गई है।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि मीडिया के लिए प्रवेश पास जारी करने और उनके वितरण की जिम्मेदारी किसकी थी। साथ ही, स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे से जुड़े आरोपों पर भी तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि किसी तरह की आशंका या भ्रम की स्थिति न रहे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मीडिया को प्रवेश से वंचित रखने की वजह क्या थी और पास वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता के मानकों का कितना पालन हुआ? वहीं, स्ट्रांगरूम के सीसीटीवी कैमरे बंद होने के आरोपों पर प्रशासन क्या जवाब देगा? इन सवालों पर जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों का स्पष्ट पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति साफ हो सकेगी।

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