SIR in UP: उत्तर प्रदेश में भाजपा के गढ़ में कट गए सबसे ज्यादा 23% वोट, मुस्लिम बहुल सीटों पर कितनी कटौती हुई?

SIR in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट के सघन पुनरीक्षण के बाद 2.04 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं। बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले शहरों में भारी कटौती ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
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उत्तर प्रदेश में भाजपा के गढ़ में कट गए सबसे ज्यादा 23% वोट, मुस्लिम बहुल सीटों पर कितनी कटौती हुई
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UP Voter List Update: उत्तर प्रदेश में हाल ही में पूरी हुई SIR प्रक्रिया के बाद कुछ ऐसा ही मंजर सामने आया है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने न केवल आम जनता को हैरान कर दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी बेचैनी पैदा कर दी है।

इस बार वोटर लिस्ट की सफाई में जो आंकड़े निकलकर आए हैं, वे उत्तर प्रदेश की भविष्य की राजनीति को एक नया मोड़ दे सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस कटौती का सबसे बड़ा प्रहार उन इलाकों पर हुआ है जिन्हें भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला माना जाता रहा है।

बड़े शहरों में भारी वोट कटौती से हड़कंप

यूपी में एसआईआर के बाद जो अंतिम सूची जारी हुई है, वह भाजपा के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी के वर्चस्व वाले बड़े शहरी इलाकों में मतदाताओं की संख्या में 18 से 23 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। केवल राजधानी लखनऊ में लगभग 22.89 प्रतिशत वोट कम हो गए हैं, जबकि गाजियाबाद में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत के करीब है। इसी तरह, नोएडा में 19.33 प्रतिशत, कानपुर नगर में 19.42 प्रतिशत और मेरठ में 18.75 प्रतिशत वोट कम हुए बताए जा रहे हैं। ये वही शहर हैं जहां भाजपा लगातार अजेय रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रक्रिया की शुरुआत में ही संकेत दिया था कि पुनरीक्षण में भाजपा समर्थकों के वोट बड़ी संख्या में कट सकते हैं, और अब अंतिम आंकड़े उसी ओर इशारा कर रहे हैं।

मुस्लिम बहुल जिलों के आंकड़े चौंकाने वाले

एक तरफ जहां भाजपा के शहरी गढ़ों में वोटों की भारी छंटनी हुई है, वहीं मुस्लिम बहुल जिलों में यह स्थिति काफी अलग नजर आती है। आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि जिन इलाकों में अल्पसंख्यक आबादी का प्रभाव अधिक है, वहां वोटों की कटौती का प्रतिशत काफी कम रहा है। उदाहरण के तौर पर देखें तो, सहारनपुर में 10.48 प्रतिशत, मुरादाबाद में 10 प्रतिशत, शामली में 10.93 प्रतिशत और मुजफ्फरनगर में 10.38 प्रतिशत वोट ही कटे हैं। अमरोहा और आजमगढ़ जैसे जिलों में भी यह आंकड़ा 9 से 10 प्रतिशत के बीच ही सिमटकर रह गया है। जानकारों का मानना है कि इसका सीधा असर मिशन-2027 की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। अब सियासी दलों को नए सिरे से अपने वोट बैंक को सहेजने के लिए मशक्कत करनी होगी।

वीआईपी सीटों पर अब जीत का नया गणित

वोटों की इस बड़ी कटौती ने राज्य की कई वीआईपी सीटों के समीकरण भी बिगाड़ दिए हैं। खासकर उन सीटों पर जहां जीत और हार का अंतर बहुत कम था, वहां अब मुकाबला बेहद रोचक होने वाला है। प्रयागराज की शहर दक्षिणी सीट पर, जहां से मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी विधायक हैं, वहां करीब 99,059 वोट कट गए हैं। पिछले चुनाव में उनकी जीत का अंतर केवल 26,182 मतों का था, ऐसे में इतनी बड़ी कटौती उनकी अगली राह को कठिन बना सकती है। इसी तरह प्रतापगढ़ की कुंडा सीट पर राजा भैया की जीत का अंतर 30,418 था, जबकि वहां 53,539 वोट कम हो गए हैं। देवरिया की पथरदेवा सीट पर भी कुछ ऐसी ही स्थिति है, जहां कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही के लिए अब नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

उत्तर प्रदेश में साल 2003 के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर यह अभियान चलाया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि दो करोड़ से ज्यादा कटे हुए नामों में अधिकांश वे लोग हो सकते हैं जो या तो विस्थापित हो चुके हैं, या जिनकी मृत्यु हो चुकी है, या फिर जिनके पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं थे। हालांकि, विपक्षी दलों ने इस पर सवाल भी उठाए हैं।

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