Mission Saraswati: प्रयागराज से कानपुर तक प्राचीन नदी मार्ग की खोज, 1.6 करोड़ के पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत

Mission Saraswati UP: उप्र में 1.6 करोड़ रुपये का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। प्रयागराज से कानपुर तक प्राचीन नदी मार्गों का अध्ययन कर भूजल पुनर्भरण और वर्षा जल संरक्षण की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
Mission Saraswati: UP Launches ₹1.6 Crore Pilot Project to Trace Ancient River Channel and Recharge Groundwater
प्रयागराज(सोर्स- सोशल मीडिया)
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Highlights:

  • संगम प्रयागराज की पहचान "सरस्वती" को मिलेगी संजीवनी

  • सरस्वती नदी के 200 किमी लंबे नदी मार्ग के खोज की तैयारी

  • नदी मार्ग के चिन्हों की खोज के लिए 1.65 करोड़ के बजट के तीन वर्षीय प्रोजेक्ट की शुरुआत

  • प्रोजेक्ट के पहले चरण में 150 से अधिक स्थानों का हुआ चयन

  • सबसे पहले कानपुर, फतेहपुर और कौशांबी के छह स्थानों पर होगी शुरुआत

Saraswati River Paleo Channel: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार राज्य में जल संरक्षण और भूजल स्तर को सुधारने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है। इसके अंतर्गत प्राचीन नदियों के पेलियो चैनल की खोज के प्रयास किये जा रहे हैं । प्राचीन सरस्वती नदी भी इसी का हिस्सा है जिसे लेकर भूगर्भ जल विभाग की तरफ पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई है।

पुरानी नदियों के मार्गों की स्थिति जानने के लिए मिशन सरस्वती

संगम नगरी प्रयागराज को गंगा, यमुना और सरस्वती तीन नदियों का संगम माना गया है। इसमें सरस्वती की धारा अदृश्य है जो पौराणिक संदर्भों में एक हकीकत थी लेकिन बाद में यह अदृश्य हो गई। इसके 200 किमी लंबी जिस पेलियो चैनल की खोज वैज्ञानिकों ने किया था अब उसे नए रूम में संजीवनी देने की तैयारी है।

इसके लिए 1.6 करोड़ की लागत के एक पायलट प्रोजेक्ट पर भूगर्भ जल विभाग कार्य कर रहा है। भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ राजेश कुमार प्रजापति बताते है कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से इसे आर्थिक सहयोग और राष्ट्रीय भू भौतिकीय अनुसंधान संस्थान तकनीकी सहयोग दे रहा है। डॉ राजेश कुमार का कहना है कि प्रोजेक्ट के लिए पहला सर्वे 2022 में कराया गया था उसी के आधार पर आगे का प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसमें NGRI के वैज्ञानिकों ने भू भौतिकीय सर्वे और बोरहोल जांच के माध्यम से पुराने नदी मार्ग की पहचान हुई है। इसके कई स्थानों पर पांच किलोमीटर तक की चौड़ाई होने की संभावना है।

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प्रयागराज से कानपुर के बीच नदी मार्ग में स्थल चिन्हित

तीन चरणों में यह प्रोजेक्ट चलेगा, लगभग 200 किमी लम्बे इस नदी मार्ग में रेत और कंकड़ अधिक होने की परतें अधिक होने की वजह से जल में और आसानी से पहुंचने और संचयन की संभावना है।

अध्ययन से गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जल भंडार और पुराने नदी मार्गों की स्थिति को समझने में मदद मिलेगी। पहले चरण में कानपुर, कौशांबी और फ़तेहपुर के 6 स्थानों पर काम भी शुरू हो चुका है। वैसे प्रोजेक्ट में 150 से अधिक स्थलों का चिन्हीकरण किया जाएगा। पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर इसके विस्तार का निर्णय लिया जाएगा। डॉ राजेश कुमार प्रजापति का कहना है कि इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य वर्षा जल को बहकर बर्बाद होने से रोकना और उसका भूजल भंडार में पुनर्भरण करना है।

भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ राजेश कुमार प्रजापति का कहना है कि अध्ययन से गंगा-यमुना दोआबा के नीचे मौजूद जलभंडार और पुराने नदी मार्गों की स्थिति को समझने में मदद मिलेगी है। इसी आधार पर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जा रहा है।

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जल पुनर्भरण और जल संरक्षण के दूरगामी लाभ

इस प्रॉजेक्ट से एक तरफ प्राचीन पवित्र सरस्वती नदी के अस्तित्व से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है तो नदियों में जल संकट का स्थायी समाधान भी मिल सकता है।

भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति के अनुसार, 2022 में कराए गए प्राथमिक सर्वे के बाद अब धरातल पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है। भूगर्भ में बालू (रेत) और कंकड़ की परतें होने के कारण वर्षा जल का अवशोषण बहुत तेजी से होता है।

इसके माध्यम से यह भी पता लग सकेगा कि बारिश के व्यर्थ बह जाने वाले पानी को भूगर्भ में मौजूद इस विशाल प्राकृतिक जलभंडार में कैसे रीचार्ज किया जाय।

चयनित क्षेत्र कानपुर से प्रयागराज तक के पूरे क्षेत्र के गिरते भूजल स्तर को स्थायी मजबूती दे सकता है। इसके अलावा सरकार इस पायलट प्रोजेक्ट के परिणामों के आधार पर योजना का दायरा पूरे राज्य के अन्य प्राचीन भूगर्भीय जलमार्गों तक बढ़ाने पर काम कर सकती है। योगी सरकार के इस प्रयास से न केवल आस्था की प्रतीक नदी को नया जीवन मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

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