

Allahabad High Court Adoption Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि जैविक पिता अपने नाजायज बेटे को भी विधि के अनुसार गोद ले सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता है, उसके द्वारा बच्चे को गोद लेना अवैध नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने बुद्धिराम व अन्य की ओर से दाखिल द्वितीय अपील को खारिज करते हुए की। मामला वर्ष 1979 के ट्रायल कोर्ट के फैसले और दो फरवरी 1980 को जिला जज, बस्ती के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा था। निचली अदालतों के फैसलों में संबंधित पक्षों के दावों और जमीन से जुड़े विवाद पर निर्णय दिया गया था।
मामले के तथ्यों के अनुसार बच्चे का जन्म बदले हुए पारिवारिक संबंधों के बीच हुआ था। रिकॉर्ड के मुताबिक उसका संबंध बद्लू से था। बद्लू ने उसे आठ नवंबर 1970 को गोद लिया था। आरोप लगाया गया कि प्रतिवादियों ने बच्चे को इलाज के बहाने अपने साथ ले जाकर वर्ष 1973 में जमीन का फर्जी बैनामा करा लिया। इसी विवाद के बीच बच्चे के वैधानिक अधिकार और जमीन पर उसके दावे का सवाल सामने आया।
अदालत ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि जैविक पिता द्वारा अपने नाजायज बेटे को गोद लेना कानूनन प्रतिबंधित नहीं है। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां बच्चे के जन्म की वैधता और उसके दत्तक ग्रहण को लेकर विवाद खड़ा होता है।
मामले में यह सवाल भी महत्वपूर्ण था कि गोद लिए गए बच्चे का पैतृक अथवा दत्तक परिवार की संपत्ति पर क्या अधिकार होगा। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए द्वितीय अपील खारिज कर दी। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट है कि बच्चे की वैधानिक स्थिति तय करते समय केवल उसके जन्म की परिस्थितियों को आधार बनाकर दत्तक ग्रहण को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।