बैंक खाता फ्रीज करने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त, कहा- वकील की फीस को अपराध की आय नहीं मान सकते
Allahabad High Court Verdict: कोर्ट ने बैंक खाता फ्रीज के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए अहम टिप्पणी की और कहा कि किसी आरोपी से कानूनी सेवाओं के बदले मिली वकील की फीस को अपराध की आय नहीं माना जा सकता।
- Reported By: ओमप्रकाश सिंह परिहार | Edited By: स्निग्धा श्रीवास्तव
इलाहाबाद हाई कोर्ट (सोर्स- फोटो नवभारत)
Allahabad High Court Verdict On Lawyer’s Fees: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिवक्ताओं की पेशेवर स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि किसी अभियुक्त द्वारा अपने वकील को कानूनी सेवाओं के बदले दी गई फीस को केवल इस आधार पर ‘अपराध की आय’ नहीं माना जा सकता कि भुगतान किसी आरोपी ने किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि अधिवक्ता स्वयं किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल है, तब तक उसकी पेशेवर फीस को अवैध आय नहीं माना जा सकता।
फर्जी लेनदेन का हवाला देकर बैंक खाता फ्रीज करने की दी चुनौती
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने कानपुर के अधिवक्ता आयुष वाजपेयी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में पुलिस की साइबर सेल द्वारा कथित फर्जी लेनदेन का हवाला देकर बैंक खाता फ्रीज किए जाने को चुनौती दी गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अपर मुख्य सचिव (गृह) से व्यक्तिगत शपथपत्र भी तलब किया है।
फीस लेना अपने आप में किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि बैंक खाते में मौजूद धनराशि विभिन्न मुकदमों में कानूनी सेवाएं देने के एवज में प्राप्त पेशेवर फीस थी। इस पर अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी को अपनी पसंद के अधिवक्ता से कानूनी सहायता लेने का संवैधानिक अधिकार है और अधिवक्ता द्वारा उस मामले की पैरवी करना या फीस लेना अपने आप में किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
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संदेहास्पद लेनदेन के आधार पर खाते फ्रीज नहीं किए जा सकते
खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि केवल इस आधार पर वकीलों के बैंक खाते फ्रीज किए जाने लगें कि उन्हें किसी आरोपी से फीस मिली है, तो इससे अधिवक्ताओं के पेशेवर दायित्वों के निर्वहन में गंभीर बाधा उत्पन्न होगी और न्यायिक व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेहास्पद लेनदेन के आधार पर बैंक खाते फ्रीज नहीं किए जा सकते। इसके लिए यह दिखाना आवश्यक होगा कि संबंधित धनराशि का अपराध से प्रत्यक्ष और ठोस संबंध है।
कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 तय की है। कानूनी जानकार इस टिप्पणी को अधिवक्ताओं की पेशेवर स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
