इलाहाबाद कोर्ट का फैसला! ‘लास्ट इन फर्स्ट आउट’ सिद्धांत को असंवैधानिक करार, समायोजन प्रक्रिया पर रोक
कोर्ट के अनुसार, ‘लास्ट इन फर्स्ट आउट’ सिद्धांत ने जूनियर शिक्षकों को हर बार ट्रांसफर होने के लिए बाध्य किया, जबकि सीनियर शिक्षक एक ही स्थान पर लंबे समय तक तैनात रहते थे।
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय
इलाहाबाद कोर्ट (फोटो सोर्स - सोशल मीडिया)
लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा लागू की गई समायोजन नीति को असंवैधानिक करार दिया है। जस्टिस मनीष माथुर की सिंगल बेंच ने ‘लास्ट इन फर्स्ट आउट’ (LIFO) सिद्धांत को अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन मानते हुए समायोजन प्रक्रिया को रद्द कर दिया है।
यह नीति जूनियर शिक्षकों को बार-बार ट्रांसफर करने और सीनियर शिक्षकों को स्थिर बनाए रखने का कारण बन रही थी, जिससे असमानता उत्पन्न हो रही थी। कोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग से यह भी कहा है कि समायोजन से जुड़ी सभी गतिविधियां तुरंत प्रभाव से रोकी जाएं और इस प्रक्रिया में हुई गलतियों को सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएं।
कोर्ट के अनुसार, ‘लास्ट इन फर्स्ट आउट’ सिद्धांत ने जूनियर शिक्षकों को हर बार ट्रांसफर होने के लिए बाध्य किया, जबकि सीनियर शिक्षक एक ही स्थान पर लंबे समय तक तैनात रहते थे।
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इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि समायोजन नीति में शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक के बराबर मानने का निर्णय भी अनुचित था। शिक्षा मित्रों के पास आवश्यक शैक्षिक योग्यता नहीं थी, इसलिए उन्हें समायोजन में शामिल किया जाना संविधान के खिलाफ था।
आपको जानकारी के लिए बताते चलें कि उत्तर प्रदेश में करीब 1.5 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं, और इस फैसले से लगभग 80-90 प्रतिशत विद्यालय प्रभावित हो सकते हैं। इस आदेश का असर राज्य के लगभग 1 लाख 35 हजार स्कूलों पर पड़ेगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के खिलाफ डबल बेंच में अपील की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में शिक्षा मित्रों का समायोजन रद्द कर दिया था। इसके अलावा, शिक्षा मित्रों और अनुदेशकों को जो वेतन मिलता है, वह नियमित शिक्षकों के मुकाबले बहुत कम है।
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