

Highlights:
यमुना के जहरीले पानी से बर्बाद हो रही खेती
डीएपी की कालाबाजारी, बिजली संकट और छुट्टा पशुओं से परेशान किसानों ने सुनाई पीड़ा
सिंचाई के पानी में ही जहर घुला है; कृषि मंत्री के सामने रखीं समस्याएं
आलू किसानों के मुआवजे और छुट्टा पशुओं की समस्या उठी
Agra Rabi Utpadak Goshthi: एक ओर केंद्र और प्रदेश सरकार किसानों की आय बढ़ाने, जैविक खेती को प्रोत्साहित करने और कृषि उत्पादन में सुधार के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर किसानों को सिंचाई के लिए प्रदूषित पानी, खाद की किल्लत, बिजली संकट, छुट्टा पशुओं और मुआवजे की जटिल प्रक्रियाओं जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। बुधवार को आगरा में आयोजित रबी उत्पादक गोष्ठी में किसानों ने जब अपनी समस्याएं प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही और प्रमुख सचिव कृषि के सामने रखीं तो खेती-किसानी से जुड़ी व्यवस्थाओं पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए।
गोष्ठी में आगरा, अलीगढ़ और बरेली मंडलों के मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारियों के साथ कृषि एवं सिंचाई विभाग के अधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान किसानों को अपनी समस्याएं सीधे सरकार के प्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियों तक पहुंचाने का अवसर मिला। आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, अलीगढ़, हाथरस और बरेली से आए किसानों ने खेती की लागत, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही समस्याओं को प्रमुखता से उठाया।
भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष मोहन सिंह चाहर ने यमुना के प्रदूषण का मुद्दा उठाते हुए कृषि मंत्री का ध्यान दिल्ली और हरियाणा की फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित पानी और जहरीले रसायनों की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि सरकार जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रही है, लेकिन यमुना के पानी में प्रदूषण और रासायनिक तत्वों की मौजूदगी किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि किसान मजबूरी में इसी पानी से अपनी फसलों की सिंचाई करते हैं। यही फसल आगे चलकर बाजार में पहुंचती है और आम आदमी उसका उपभोग करता है। ऐसे में प्रदूषित पानी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसानों की खेती और स्वास्थ्य के साथ आम लोगों की सेहत के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है।
मोहन सिंह चाहर ने कहा कि जब सरकार और किसानों का उद्देश्य जैविक खेती को बढ़ावा देना है तो सिंचाई के पानी को प्रदूषण मुक्त करना भी प्राथमिकता होनी चाहिए। पानी ही दूषित रहेगा तो स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? उन्होंने इस समस्या पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई की मांग की।
मोहन सिंह चाहर ने ग्रामीण बैंकों के माध्यम से किसानों को ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों को उनकी फसलों का उचित बीमा लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने किरावली स्थित ग्रामीण बैंक का मामला भी कृषि मंत्री के सामने रखा।
किसानों का कहना था कि खेती में प्राकृतिक आपदाओं और अन्य जोखिमों के बीच फसल बीमा उनके लिए सुरक्षा कवच होना चाहिए, लेकिन यदि समय पर और उचित लाभ नहीं मिलता तो आर्थिक संकट और गहरा जाता है।
गोष्ठी में किसानों ने आगरा में कृषि कार्यों के लिए बिजली की उपलब्धता और नए बिजली कनेक्शन मिलने में आ रही दिक्कतों को भी उठाया। किसानों ने कहा कि खेती के लिए बिजली की जरूरत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उन्हें पर्याप्त बिजली और कनेक्शन उपलब्ध कराने में परेशानी हो रही है। उन्होंने मांग की कि निर्धारित शुल्क लेकर ही सही, किसानों को कृषि कार्यों के लिए बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराए जाएं।
डीएपी खाद की उपलब्धता का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। किसानों ने आरोप लगाया कि रात 12 बजे से सुबह दो बजे के बीच डीएपी की बिक्री की जा रही है, लेकिन जरूरत के समय किसानों को खाद उपलब्ध नहीं हो पा रही है। किसानों ने खाद की आपूर्ति और वितरण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कालाबाजारी पर रोक लगाने की मांग की।
किसानों ने आलू की खेती से जुड़े संकट और मुआवजा वितरण की प्रक्रिया पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि मुआवजा प्राप्त करने के लिए किसानों से तमाम तरह के दस्तावेज और रसीदें मांगी जाती हैं, जबकि कई मामलों में खेत का मालिक कोई और होता है और फसल की बुवाई से लेकर उसकी देखभाल तक की जिम्मेदारी बेटा या परिवार का दूसरा सदस्य निभाता है।
ऐसी स्थिति में किसानों के सामने सवाल खड़ा हो जाता है कि फसल का नुकसान होने पर मुआवजा किसे और किस आधार पर मिलेगा। किसानों ने मांग की कि मुआवजा वितरण की प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाया जाए, ताकि वास्तविक रूप से खेती करने वाले किसान को राहत मिल सके।
किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने भी गोष्ठी में अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने एक मंडल स्तरीय अधिकारी की ओर से जारी पत्र का मामला उठाते हुए कहा कि पत्र पर न तो तारीख दर्ज है और न ही पत्रांक संख्या। उन्होंने सवाल किया कि आखिर बिना इन जरूरी विवरणों के कोई अधिकारी पत्र कैसे जारी कर सकता है?
श्याम सिंह चाहर ने संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए यहां तक कहा कि ऐसे अधिकारी को चपरासी बना दिया जाना चाहिए। उनका आरोप था कि अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और प्रशासनिक कार्यों में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
श्याम सिंह चाहर ने हाथरस जिले में खाद की कथित कालाबाजारी का मामला भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में खाद भरकर उसकी बिक्री की जा रही है और किसानों को निर्धारित व्यवस्था के तहत खाद नहीं मिल पा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब किसान इस संबंध में जानकारी जुटाने पहुंचते हैं तो संबंधित अधिकारी मौके से चले जाते हैं। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच कराकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग की।
किसान नेता ने एक अन्य प्रकरण में आरोप लगाया कि एक अधिकारी ने उन्हें मानसिक रोगी घोषित कर दिया था। उनके मुताबिक, इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जांच के आदेश दिए थे और जांच भी हुई, लेकिन संबंधित रिपोर्ट को डीआर स्तर पर दबा दिया गया। उन्होंने इस मामले में जांच की स्थिति स्पष्ट करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
श्याम सिंह चाहर ने डीएपी की कीमत को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि डीएपी के एक कट्टे पर 1,600 रुपये मूल्य अंकित होने के बावजूद किसानों से कथित तौर पर 2,200 रुपये प्रति कट्टा वसूले जा रहे हैं। उन्होंने इसे कालाबाजारी बताते हुए कृषि मंत्री और प्रमुख सचिव से मामले की जांच कराने की मांग की। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
आगरा के एक अन्य किसान ने छुट्टा पशुओं की समस्या को क्षेत्र का सबसे ज्वलंत मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि आगरा और आसपास के जिलों में खुलेआम घूमने वाले पशु खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। किसानों को अपनी मेहनत से तैयार की गई फसल बचाने के लिए सर्दियों में भी रात-रातभर जागकर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।
किसानों ने कहा कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि फसल को छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए अतिरिक्त मेहनत और समय लगाना पड़े तो किसानों की परेशानी और बढ़ जाती है। उन्होंने इस समस्या के स्थायी समाधान की मांग की।
गोष्ठी में फिरोजाबाद से पहुंचे एक बुजुर्ग किसान ने किसानों को जैविक खेती अपनाने की सलाह दी। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह कई वर्षों से जैविक खेती कर रहे हैं। शुरुआत में उत्पादन कुछ कम हो सकता है, लेकिन उनके अनुसार इससे प्रदूषण रहित और बेहतर गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त करने में मदद मिलती है। उन्होंने दावा किया कि समय के साथ मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सुधार हो सकता है।
किसान ने खेतों में केंचुओं की उपयोगिता पर जोर देते हुए कहा कि किसानों को वर्मीकम्पोस्ट और केंचुओं से तैयार जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरकता बढ़ाने में मदद मिलती है। उन्होंने बताया कि जैविक खेती के अपने अनुभव के कारण उन्हें मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी दो से तीन बार मिलने का अवसर मिला है।
गोष्ठी के दौरान कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने प्रमुख सचिव कृषि की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि सरकार देश को उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक एक सूत्र में जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। इसी क्रम में प्रमुख सचिव दक्षिण भारत से आते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कृषि मंत्री ने कहा कि हिंदी बोलने और समझने में परेशानी होने के बावजूद प्रमुख सचिव किसानों के हित में लगातार काम कर रहे हैं। उनके इस बयान के जरिए मंत्री ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि भाषा की कठिनाई के बावजूद किसानों के हित और विभागीय जिम्मेदारियों के निर्वहन को प्राथमिकता दी जा रही है।
रबी उत्पादक गोष्ठी का उद्देश्य आगामी फसल सीजन की तैयारियों और कृषि से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा करना था, लेकिन किसानों की शिकायतों ने खेती-किसानी से जुड़े कई बुनियादी सवाल सामने ला दिए। कहीं सिंचाई के पानी की गुणवत्ता चिंता का विषय है तो कहीं खाद और बिजली की उपलब्धता। कहीं फसल बीमा और मुआवजे की प्रक्रिया किसानों के लिए परेशानी बन रही है तो कहीं छुट्टा पशु उनकी मेहनत पर पानी फेर रहे हैं।
किसानों ने कृषि मंत्री और प्रमुख सचिव के सामने अपनी समस्याएं रखकर समाधान की उम्मीद जताई। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि गोष्ठी में उठाए गए मुद्दों पर संबंधित विभाग कितनी गंभीरता से कार्रवाई करते हैं और किसानों को राहत देने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।