
No Cost EMI के पीछे की सच्चाई (सोर्स-सोशल मीडिया)
Financial Risks Of No Cost EMI: ऑनलाइन शॉपिंग के इस आधुनिक दौर में “No Cost EMI” ग्राहकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। हर कोई मोबाइल, लैपटॉप या फर्नीचर जैसे सामान शून्य ब्याज पर किस्तों में खरीदना समझदारी मानता है। लेकिन जिसे हम राहत समझते हैं, वह अक्सर हमें आर्थिक दबाव और भारी कर्ज के जाल में धकेल देती है। नो कॉस्ट EMI के वित्तीय जोखिम के बारे में जानना हर जागरूक उपभोक्ता के लिए अनिवार्य है।
नो कॉस्ट EMI के पीछे का पहला कड़वा सच यह है कि बैंक वास्तव में आपसे पूरा ब्याज वसूलता है। विक्रेता या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म उस ब्याज की रकम को उत्पाद पर मिलने वाले डिस्काउंट के रूप में दिखाते हैं। इसका मतलब है कि आपको मिलने वाली सीधी छूट ही असल में ब्याज की भरपाई करने के लिए इस्तेमाल होती है।
जब आप नो कॉस्ट EMI का विकल्प चुनते हैं, तो कई बार अन्य आकर्षक बैंक ऑफर्स तुरंत गायब हो जाते हैं। कैशबैक या इंस्टेंट कार्ड डिस्काउंट जैसे लाभ उन ग्राहकों को नहीं मिलते जो किस्तों में भुगतान चुनते हैं। अंत में उपभोक्ता को वह उत्पाद उतना ही या उससे अधिक महंगा पड़ता है जितना कि एकमुश्त भुगतान पर।
शून्य ब्याज के दावे के बावजूद ग्राहकों को प्रोसेसिंग फीस और उस पर लगने वाला अतिरिक्त GST देना पड़ता है। ये छिपे हुए खर्च EMI की कुल लागत को बढ़ा देते हैं और ग्राहक को इसके बारे में अक्सर पता नहीं चलता। किस्त लेते समय इन खर्चों की गणना न करना आपके मासिक बजट को पूरी तरह से बिगाड़ सकता है।
EMI का उपयोग करने से आपकी क्रेडिट लिमिट कम होती है और बाजार में आपका क्रेडिट एक्सपोजर बढ़ जाता है। भविष्य में होम लोन या पर्सनल लोन लेते समय यह बढ़ी हुई क्रेडिट सीमा आपके लिए बाधा बन सकती है। अगर आप किसी भी कारण से समय पर किस्त नहीं चुका पाते, तो आपका क्रेडिट स्कोर खराब हो जाता है।
खरीदारी करने से पहले हमेशा EMI और एकमुश्त भुगतान की कुल लागत के बीच तुलना करना बहुत जरूरी है। अपनी वर्तमान आय और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर ही किसी बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी का फैसला लें। एक जागरूक ग्राहक वही है जो बिना सोचे-समझे किसी भी “शून्य ब्याज” वाले लुभावने वादे पर भरोसा नहीं करता।






