India Nuclear Emergency Preparedness( Source: Social Media )
India Nuclear Emergency Preparedness: अमेरिका, ईरान, इजराइल तथा वह देश जो खाड़ी युद्ध में फंसे हुए हैं, अब इस बात की तैयारी कर रहे हैं कि यदि न्यूक्लियर इमरजेंसी हुई, तो वह अपने नागरिकों को कैसे सुरक्षित रख पाएंगे? इसके विपरीत भारत की स्थिति देखिए, यहां के महानगरों के साथ ही प्रदेश की राजधानियों में भी ऐसी व्यवस्था नहीं है कि यदि कोई देश भारत को युद्ध के लिए मजबूर करता है, तो भारतीय कहां जाकर हमले के समय खुद को सुरक्षित महसूस कर सकेंगे? न्यूक्लियर इमरजेंसी तो दूर की बात है।
न तो कहीं पर भूमिगत बंकर हैं, न ही हमले के दौरान एकीकृत सायरन व्यवस्था है, न ही अस्पतालों में कोई ऐसी इमरजेंसी यूनिट है, जो आम जनता की जान बचाने के लिए मुफीद कहीं जा सके, यह बात कम नहीं है कि परमाणु आपदा के समय काम आने वाली दवा बनाने वाली कंपनी चंड़ीगढ़ में है और उससे खाड़ी देश लगातार संपर्क में हैं तथा दवाओं पर बातचीत कर रहे हैं।
सर्वाधिक पूछताछ प्रशियन ब्लू नामक दवा की है। लेकिन क्या हमारी सरकार भी इसके लिए सजग है? जब कोई देश हमला कर दे तो देश में वॉर इमरजेंसी लगाई जाती है। भारत में पाकिस्तान तथा चीन से युद्ध के समय इसे लगाया जा चुका है। इसमें नागरिकों की जान बचाना सबसे अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है।
रिहायशी इलाकों पर हमला न हो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम हैं, लेकिन जब लड़ाई का स्तर ईरान और इजराइल जैसा हो तो स्कूल, अस्पताल या रिहायशी क्षेत्र भी अछूते नहीं रहते।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी वॉर इमरजेंसी में नागरिकों की जान बचाने के लिए उनके निवास क्षेत्र में भूमिगत बंकर होने चाहिए, जैसे कि इजराइल, स्विट्जरलैंड, अल्बानिया, अमेरिका, चीन, रूस, सिंगापुर, जापान जैसे देशों में हैं।
इनमें कई देशों में तो परमाणु हमले से बचाने वाले बंकर हैं, ऐसा कहा जाता है। स्विट्जरलैंड में दुनिया के सबसे अधिक बंकर हैं। कुछ देशों में यह कहीं-कहीं शहरों की शक्ल में हैं, जहां एक बार में कई हजार व्यक्ति शरण पा सकते हैं।
वैसे भूमिगत बंकर, हवाई हमले से बचने के काम आते हैं, तो परमाणु बंकर रेडिएशन के साथ ही उन हमलों से भी बचा सकते हैं, जिन्हें जैविक युद्ध कहा जाता है। भारत में सर्वाधिक चंकर पाकिस्तानी तथा चीनी हमले वाले क्षेत्रों में हैं।
राजौरी में करीबन 4 हजार चंकर बताए जाते हैं, यहां पर पाकिस्तान जब-तब अपनी ताकत को परखता रहता है। जम्मू-कश्मीर के दूसरे क्षेत्रों में भी बंकर हैं, जिन्हें मोदी बंकर कहा जाता है। जो थोड़े बहुत हैं वह सिर्फ सेना के लिए हैं।
हां, जम्मू-कश्मीर में जरूर कारगिल जैसे बुद्ध के बाद आम जनता के लिए बंकर बनाए गए हैं। वॉर इमरजेंसी में कैसे नागरिकों की जान बचे, इस पर न तो विपक्ष सरकार से पूछ रहा है और न ही अभी तक किसी सामाजिक संगठन ने सरकार से मांग की है।
खुद सरकार क्या कर रही है? बस हर कहीं कोरोना स्टाइल गैस नहीं, रोजगार नहीं, हाय महंगाई का रोना है। जबकि वॉर इमरजेंसी पर भी काम होना चाहिए, यदि देश में, विशेषकर शहरों में भूमिगत बंकर हैं, तो कहां हैं? जनता को कौन बताएगा? नागरिक सुरक्षा संगठन जैसे संगठन कहां हैं और वह क्या तैयारी कर रहे हैं? क्या देश में सिर्फ आगजनी, आतंकवादियों से बचने के लिए ही माँक डिल होगी? देश के जो भूमिगत मार्ग हैं क्या वह मिसाइल हमले के दौरान सुरक्षित हो सकते हैं? भूमिगत पार्किंग स्थल कितने सुरक्षित हैं, बहुमंजिली इमारतों के बेसमेंट कितने सुरक्षित हैं? यदि हेस्को बंकर बनाए जाएंगे तो कब और कहां?
इमरजेंसी सायरन कितने शहरों में हैं, जो जनसामान्य को चेता सके? वैसे महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर जब सायरन बजता है, तो स्थानीय 10 प्रतिशत जनता को भी पता नहीं चलता।
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यह कहा जा सकता है कि इसके लिए कारखानों के सायरन इस्तेमाल किए जा सकते हैं, लेकिन क्या यह आबादी क्षेत्र तक अपनी आवाज पहुंचा पाएंगे? हमले के दौरान निशाने पर विरासती इमारतें, रिफाईनरियां, विद्यतु संयंत्र, हवाई अड्डे आदि कैसे बचेंगे, इसकी क्या व्यवस्था है? भले ही परमाणु हमला बहुत बड़ी बात है पर आम हमले में हम कैसे बचेंगे, यह हमें कौन बताएगा, सरकार या सोशल मीडिया?
लेख-मनोज वाष्र्णेय के द्वारा