नवभारत संपादकीय: पेट्रोल-डीजल नीति पर बहस तेज, जनता को ज्ञानोपदेश खुद आचरण नहीं
Oil Tax Debate: कच्चे तेल के दाम और टैक्स नीति को लेकर सरकार की भूमिका पर सवाल उठते हैं। ई-वाहन नीति और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की धीमी रफ्तार पर भी बहस तेज है।
- Written By: अंकिता पटेल
पीएम मोदी ई-वाहन नीति,(सोर्स: सोशल मीडिया)
India Fuel Pricing Policy: पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ का अर्थ है दूसरों को अज्ञानी प मानकर उन्हें उपदेश और ज्ञान की भरपूर खुराक दो लेकिन खुद उस पर अमल न करो। यही चल रहा है। जब कच्चे तेल के दाम बहुत नीचे चले गए थे, तब सरकार ने भारी टैक्स लगाकर जनता को लूटा। तेल कंपनियों ने अंधाधुंध मुनाफा कमाया और सरकार को मोटी रकम लाभांश (डिविडेंड) के रूप में दी। अब क्रूड आयल के दाम बढ़ने पर तेल कंपनियों को हो रहे भारी घाटे की दुहाई देते हुए सरकार जनता को बचत और काटकसर की सलाह दे रही है। किसी भी राज्य सरकार ने बैट कम नहीं किया।
‘मेक इन इंडिया’ का ढोल पीटा गया, लेकिन विदेशी मुद्रा भारत में नहीं आई, विदेशी पर्यटकों को भारत के प्रति आकर्षित करने के लिए क्या किया गया? विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से क्यों मुंह फेर रहे हैं? पेट्रोल-डीजल वाहनों का कम इस्तेमाल करने की सीख दी जा रही है। पिछले । दशक में भारत में ई-वाहन नीति को अधिक प्रभाव से लागू कर ईंधन का सक्षम विकल्प देने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? इस दौरान चीन ने युद्ध स्तर पर ई-वाहनों को बढ़ावा देकर पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम की।
इतने वर्षों में ईंधन का इतना सुरक्षित भंडार क्यों नहीं निर्मित किया गया, जो 6 महीने काम आए। गत 28 फरवरी को इजराइल ने ईरान पर हमला शुरू किया। अमेरिका भी इजराइल का साथ देने लड़ाई में कूद पड़ा। होमुंज की खाड़ी बंद हुई तथा पेट्रोल, डीजल, यूरिया, एलपीजी संकट की तलवार सिर पर लटकने लगी लेकिन सरकार लगातार कहती रही कि स्थिति नियंत्रण में है। इसकी वजह साफ थी। सामने 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव थे और बीजेपी हर कीमत पर जीत हासिल करना चाहती थी। उसके सामने देशहित नहीं, बल्कि चुनावी जीत सबसे बड़ी प्राथमिकता थी।
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आर्थिक अनुशासन और सरकारी प्राथमिकताओं पर उठे सवाल
आंधी आने का अंदेशा होने पर शुतुरमुर्ग अपना सिर रेत में छिपा लेता है। बिल्ली भी यह सोचकर आंख मंदकर दूध पीने लगती है कि कोई उसे देख नहीं रहा है। चुनाव के दौरान पीएम ने देशवासियों को त्याग और किफायत बरतने का कोई उपदेश नहीं दिया।
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चुनाव के ठीक बाद उन्होंने 2 दर्जन से ज्यादा वाहनों के काफिले के साथ रोड शो किया। अब वह खुद यूरोपीय देशों के दौरे पर जा रहे हैं। चुनाव जीतने के उद्देश्य से हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए और रेवड़ियां बांटी गई। तब आर्थिक अनुशासन कहां गया था? अपनी तमाम भूलों और विफलताओं पर पर्दा डालकर आत्मस्तुति में लगी सरकार की कौन-सी उपलब्धियां हैं? विपक्ष के ज्वलंत व तीखे सवालों का जवाब नहीं दिया जाता। 2047 तक भारत को विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाने का दिवास्वप्न दिखाकर जनमानस को बहलाया जाता है।
