चीन-अमेरिका के परस्पर विरोधी हित को साधना हो जाएगा असाध्य, पाक को महंगी पड़ेगी दो नावों की सवारी
फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की पिछले दिनों तियानजिन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर हुई मुलाकात ने निकट भविष्य में पाकिस्तान की बढ़ती मुश्किलों का पुख्ता संकेत दे दिया है।
- Written By: दीपिका पाल
पाकिस्तान को महंगी पड़ेगी दो नावों की सवारी (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दो बार ‘नमक’ खा चुके फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की पिछले दिनों तियानजिन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर हुई मुलाकात ने निकट भविष्य में पाकिस्तान की बढ़ती मुश्किलों का पुख्ता संकेत दे दिया है।पाकिस्तान को जल्द ही अपने सदाबहार मित्र और सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता चीन और अमेरिका के परस्पर विरोधी सामरिक, सुरक्षा और आर्थिक हितों में संतुलन साधना असाध्य होने वाला है।ट्रंप के लिए पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति मनमाफिकः बड़ा सवाल उठता है कि पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान पर अमेरिका को ‘झूठ और धोखे के अलावा कुछ नहीं’ देने का आरोप लगाने वाला ट्रंप प्रशासन अब अचानक पाकिस्तान को एक ‘अभूतपूर्व साझेदार’ क्यों बना रहा है? इसका जवाब ईरान, अफगानिस्तान और चीन की सीमा से सटे पाकिस्तान की अनोखी भौगोलिक स्थिति में छिपा है।
ईरानी शासन को अस्थिर करने से लेकर चीन को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान और अफगानिस्तान में खनिज भंडारों पर नियंत्रण के अलावा ट्रंप की नीतियां पूरे दक्षिण एशियाई सामरिक परिदृश्य को नया रूप दे सकती हैं।अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण कदम इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर को निजी भोज पर आमंत्रित करना था, तो ईरान के मामले में अमेरिका पाकिस्तान से क्या मदद चाहता था? क्या यह 1953 के एक और ‘ऑपरेशन अजाक्स’ के लिए था, जिसे सीआईए और एमआई 6 ने मिलकर तत्कालीन ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को हटाकर उसकी जगह ईरान के तेल भंडारों पर नियंत्रण के लिए एक आज्ञाकारी शासक को स्थापित करने के लिए शुरू किया था? क्या पाकिस्तान आज भी ईरान के खिलाफ भी ऐसा ही करने को तैयार होगा?
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नोबेल की वकालत ने ड्रैगन को चिढ़ा दिया हैः
अमेरिका-इजराइल हमले के खिलाफ रूस और चीन द्वारा ईरान का समर्थन करने के साथ पाकिस्तान को ऐसे किसी भी कदम के लिए चीन के गुस्से का जोखिम उठाना होगा।बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान के निकटवर्ती इलाकों अमेरिकी उपस्थिति निश्चित रूप से अस्थिरता पैदा करेगी।इस क्षेत्र में इस्लामी समूहों से निपटने के मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच मतभेद एक और विवाद का विषय है।चीन को संदेह है कि अमेरिका पाकिस्तान में उसके हितों को निशाना बनाने के लिए बलूच अलगाववादियों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का इस्तेमाल करता है।फिलवक्त पाकिस्तान को यह एहसास नहीं हो रहा कि चीन ने भारत को नाराज करने की कीमत पर उसे सैन्य और रणनीतिक समर्थन दिया था।उस वक्त उसे यह नहीं पता था कि पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व ट्रंप की तारीफों के पुल बांध उसके आगे नतमस्तक हो जाएगा।यानी एससीओ में शहबाज-मुनीर की उपस्थिति से अमेरिका की भवें चढ़ गई हैं, तो पहले ट्रंप को नोबेल पुरस्कार की वकालत कर वह ड्रैगन को फुफकारने पर मजबूर कर चुका है।अब यह समय बताएगा कि नापाक दो नावों की सवारी कितनी दूर तक चलेगी !!!
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बहुत जल्द चीन और अमेरिका अपने-अपने एहसानों के एवज में प्रतिस्पर्धी और परस्पर विरोधी मांगें उठाएंगे, जिन्हें पूरा करना पाकिस्तान के सैन्य-नागरिक शासन के लिए मुश्किल होगा।हालांकि असली प्रतिस्पर्धा और हितों का टकराव पाकिस्तान के बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान के निकटवर्ती इलाकों में लीथियम और दुर्लभ खनिज संसाधनों तक पहुंच को लेकर होगा.
लेख- निहार रंजन सक्सेना के द्वारा
