नवभारत विशेष: भारत-पाक युद्ध छिड़ा तो क्या होगा अंजाम ? जानिए देश के लिए इसके फायदे और नुकसान
युद्ध होने पर भारत के लिए क्या नुकसान और फायदे हैं और पाकिस्तान के लिए यह कितना घातक होगा? पाकिस्तान भयभीत है और उसे अपनी कमजोरी का अहसास है। वह आत्मघाती कदम नहीं उठाएगा।
- Written By: दीपिका पाल
भारत-पाक युद्ध छिड़ा तो क्या होगा अंजाम (सौ,डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: जल्द ही भारत और पाकिस्तान में युद्ध होने की आशंका है। यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान के साथ इस्लामिक देशों के संगठन और चीन के आने की कितनी आशंका है? अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन, तुर्की, सऊदी अरब इत्यादि की इसमें क्या भूमिका होगी? क्या नाभिकीय युद्ध का भी खतरा है? इसका परिणाम क्या होगा? इसमें भारत के लिए क्या नुकसान और फायदे हैं और पाकिस्तान के लिए यह कितना घातक होगा? पाकिस्तान भयभीत है और उसे अपनी कमजोरी का अहसास है। वह आत्मघाती कदम नहीं उठाएगा।
भारत भी पाकिस्तान को दूसरे अहिंसक विकल्पों से पर्याप्त परेशान करेगा, लेकिन पूर्ण युद्ध की पहल से बचेगा। यदि पाकिस्तान की सरकार और सेना अदूरदर्शितापूर्ण फैसला लेते हुए, चीन के बहकावे में भारत को युद्ध का उत्तरदायी ठहराते हुए कोई सैन्य प्रतिक्रिया की पहल करते हैं, तो निस्संदेह भारत उसका जवाब देगा। क्योंकि आतंकवाद को जवाब देना हमारा राष्ट्रीय संकल्प है। महज नाभिकीय हथियारों की बराबरी के अलावा सभी दूसरे सैन्य क्षेत्रों में पिछड़े पाकिस्तान के लिए यह बहुत विकट स्थिति होगी, क्योंकि पाकिस्तान की तुलना में लगभग नौ गुना अधिक रक्षा पर खर्च करने वाले भारत के खिलाफ जंग में चीन का समर्थन उसे खुलकर नहीं, परोक्षतः ही होगा।
इस्लामिक देशों में तुर्की के अलावा शायद ही कोई खुलकर उसके साथ आए। रूस, अमेरिका, यूरोप इस युद्ध में उत्सुक दर्शक की भूमिका में होंगे, जो यह देख रहे होंगे कि उनकी रक्षा प्रणालियां, हथियार, कितने गुणवत्तापूर्ण है, चीनी हार्डवेयर कैसे काम कर रहे हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह युद्ध बर्बादी की ओर धकेलने वाला होगा। निस्संदेह यह जंग भारत में भी आर्थिक मंदी और अंतर्राष्टीय दबाव बढ़ाने वाला होगा।
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स्थिति खतरनाक मोड़ पर
भारत और पाकिस्तान 2016 और 2019 के बाद एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर हैं। इस बीच प्रधानमंत्री से मुलाकात के ठीक बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का कहना कि, ‘जनता जो चाहती है, वह होकर रहेगा।’ खुद प्रधानमंत्री इस मामले में ऐसे कई बयान दे चुके हैं, जिसके निहितार्थ यही निकलते हैं कि वे पहलगाम की आतंकी घटना को पाकिस्तान समर्थित हमला तथा इसके प्रतिकार स्वरूप युद्ध को न्यायोचित मानते हैं। सरकार ने आयात रोकने, सीमा पार आवाजाही, वीजा सेवा निरस्त करने, सिंधु समझौता निलंबित करने, पाकिस्तानी विमानों के लिए हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंधित लगाने जैसे कदम उठाने के अलावा चिनाब का पानी रोक दिया, तो पाकिस्तान ने अपने बंकर दुरुस्त किए।
सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वालों को सचेत किया, अबाबील और अब्दाली जैसी मिसाइलों का परीक्षण किया, सीमा पर सीज फायर का उल्लंघन करते हुए गोलीबारी बढ़ा दी। प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को साफ संकेत दिया कि देश पाकिस्तान की इस बेजा भड़काऊ हरकत की सशक्त सैन्य प्रतिक्रिया की तैयारी में है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री को रणनीतिक, कूटनीतिक, राजनीतिक स्तर पर युद्ध अनिवार्य लगे और रक्षामंत्री को यह जनता की चाहत महसूस हो। प्रधानमंत्री पर इसका जोरदार जवाब देने का भारी दबाव हो, तो ऐसी जनभावना की निर्मिति स्वाभाविक है कि वर्तमान में युद्ध आवश्यक है। वैसे भी 2001 में संसद हमले, 2008 में मुंबई पर आतंकी आक्रमण तथा 2016 में उरी और 2019 में पुलवामा के बाद तीखी प्रतिक्रियाओं एवं सांकेतिक कार्रवाई के बाद युद्ध की नौबत नहीं आई, तो इस बार ऐसा क्या अलग है कि भारत-पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध शुरू करेगा।
लड़ाई समस्या का हल नहीं
बेशक, युद्ध खुद में एक समस्या है, मसले का हल नहीं। यह दोनों देशों को दूरगामी नुकसान पहुंचाने वाला है, पर यह सब जानने के बावजूद बड़ी संख्या ऐसी सोच रखने वालों की है, जो आतंकी देश को सबक सिखाने का सर्वोत्तम विकल्प युद्ध को मानते हैं। एक ऐसा विनाशकारी युद्ध, जिसमें हारने के बाद दुश्मन फिर कभी ऐसी हिमाकत न करे। पर इसकी गारंटी कौन लेगा? पहलगाम की घटना के बाद पखवाड़ा बीत चुका है। सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अत्यंत परिपक्व, वैश्विक स्तर के राजनेता हैं, उनकी सोच जनता से आगे और फैसले अप्रत्याशित रहते हैं। वे जो भी कि को फैसला लेंगे, वह बहुत सुविचारित होगा। संभव है वे जंग के अलावा किसी और जुबान में पाकिस्तान जवाब दें कि वह अवाक रह जाए। उसे ऐसी सीख मिले कि अगली बार ऐसी आतंकी साजिश से पहले सौ बार सोचे, साथ ही देश की जनता की जो चाहत
है वह भी पूरी हो जाए।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा
