नवभारत विशेष: ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात क्या गुल खिलाएगी ? बातचीत का मुख्य मुद्दा व्यापार होगा
Donald Trump Xi Jinping Meeting News: बीजिंग में ट्रंप-शी मुलाकात वैश्विक राजनीति का बड़ा मोड़ बन सकती है। व्यापार, ताइवान, AI और भारत की इंडो-पैसिफिक भूमिका पर असर संभव।
- Written By: अंकिता पटेल
ट्रंप-शी मुलाकात (सोर्स: सोशल मीडिया)
US China Strategic Rivalry: अमेरिकी राष्ट्रपति और चीन के सर्वोच्च नेता शी जिनपिंग की 14 और 15 मई को बीजिंग में प्रस्तावित मुलाकात होगी। ट्रंप कहते हैं कि अमेरिका और चीन ही वो दो महाशक्तियां हैं, जो दुनिया का नेतृत्व कर रही हैं। यह वार्ता ऐसे समय हो रही है, जब अमेरिका-चीन संबंध, व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ताइवान, दक्षिण चीन सागर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर नियंत्रण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों पर तीव तनाव के दौर से गुजर रहे हैं।
चीन की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है, रियल एस्टेट संकट बना हुआ है, विदेशी निवेश घटा है और पश्चिमी देशों में चीन के प्रति अविश्वारर बढ़ा है। दूसरी ओर अमेरिका भी राजनीतिक ध्रुवीकरण, चुनावी तनाव और बढ़ते कर्ज से जूझ रहा है। चीन मानता है कि अमेरिका पहले जितना अजेय नहीं रहा, लेकिन वह अभी भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय दृष्टि से बेहद खतरनाक प्रतिद्वंद्वी है। इसलिए बीजिंग ‘सीधी टक्कर’ के बजाय ‘रणनीतिक दबाव’ की नीति अपना सकता है।
यह बैठक ‘सहयोग’ से अधिक ‘नियंत्रित प्रतिस्पर्धा का प्रयास मानी जाएगी जिसका असर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर रक्षा सुरक्षा, व्यापार, व्यवसाय और आपूर्ति श्रृंखला के अलावा ताइवान से लेकर ईरान तक हर जगह पड़ सकता है। अमेरिका और चीन दोनों भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं एक रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरा सबसे बड़ा पड़ोसी और बड़ा व्यापारिक भागीदार।
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यदि अमेरिका और चीन के बीच किसी प्रकार की सामरिक समझ बनती है, तो इसका प्रभाव भारत की इंडो-पैसिफिक भूमिका, क्वाड की सक्रियता और सीमा संबंधी समीकरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि तनाव बढ़ता है, तो भारत पर अमेरिकी रणनीतिक अपेक्षाएं और बढ़ सकती हैं।
तनाव बरकरार, फिर भी अमेरिका-चीन समझौते से उम्मीद
एक साल पहले चीन और अमेरिका एक बहुत बड़े व्यापार युद्ध के कगार पर खड़े थे। अमेरिका ने चीनी सामानों पर 145 फीसद तक का टैरिफ लगा दिया था और चीन द्वारा दुर्लभखनिज के निर्यात पर लगाए नियंत्रणों से वैश्विक उद्योग पर खतरा मंडरा रहा था, इसी खतरे ने शांति समझौते का रास्ता खोला, जिस पर अक्टूबर 2025 में सहमति बनी, दोनों ने टैरिफ कम किए, चीन ने ‘स्वर-अर्थ’ की खेप फिर से भेजना शुरू किया और अमेरिका ने चीन पर और ज्यादा निर्यात नियंत्रण लगाने से खुद को रोक लिया।
दोनों देशों के बीच इन मुद्दों को लेकर इस शांति समझौते के बावजूद तनाव कायम है। व्हाइट हाउस ने एक मेमो जारी किया, जिसमें चीनी संस्थाओं पर अमेरिकी एआई तकनीक की ‘बड़े पैमाने पर’ चोरी करने का आरोप लगाया और उसने ईरानी तेल खरीदने के लिए 5 चीनी रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगाए, यह उन चीनी फर्मों के लिए एक चेतावनी थी, जो ईरान के साथ सहयोग कर रही हैं। चीन ने ऐसी योजनाओं पर काम जारी रखा है जिनसे अमेरिकी फर्मों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
चीन दुर्लभ खनिजों की सप्लाई रोककर वैश्विक उद्योगों को ठप कर सकता है, वहीं अमेरिका हाई-टेक सामानों और वित्तीय लेन-देन पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है। वार्ता से उम्मीद जगी है कि दोनों शांति समझौते को आगे बढ़ा पाएंगे। अमेरिका के साथ चीन का व्यापार अधिशेष या सरप्लस 2018 के 400 अरब डॉलर से गिरकर पिछले साल लगभग आधा रह गया है। चीन ऐसी बहुत ज्यादा चीजें बनाता है जिनकी जरूरत अमेरिका को है, जबकि अमेरिका ऐसी बहुत कम चीजें बनाता है जिनकी जरूरत चीन को है।
बातचीत का मुख्य मुद्दा व्यापार होगा
अमेरिकी सामान के लिए चीन की चाहत मुख्य रूप से तीन ‘बी’ पर आकर टिक जाती है- बीफ, सोयाबीन वाली बीन्स और बोइंग, बीजिंग में होने वाले इस शिखर सम्मेलन में इन सभी चीजों के लिए बड़े-बड़े ऑर्डर दिए जा सकते हैं।
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इस वार्ता से भारतीय हित कई स्तरों पर प्रभावित हो सकते हैं। यदि अमेरिका, चीन के साथ व्यापारिक समझौते करता है, तो ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत को मिलने वाले निवेश अवसर सीमित हो जाएंगे, ही यदि तकनीकी और आपूर्ति श्रृंखला प्रतिस्पर्धा तेज होती है, तो भारत को वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में लाभ भी मिल सकता है।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा
