नवभारत संपादकीय: आपराधिक मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार
Supreme Court Warning: आपराधिक मामलों की सुनवाई और जांच में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई। समय पर जांच और मजबूत सबूत पेश करना सरकार व पुलिस की जिम्मेदारी है।
- Written By: अंकिता पटेल
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Criminal Trial Delay Maharashtra: किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक है कि उसकी किसी चूक के लिए अदालत उसे फटकार सुनाए। सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई में विलंब को लेकर महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथ लिया है। यदि पुलिस की कार्यप्रणाली शिथिल है और वह निश्चित समय सीमा के भीतर पुख्ता सबूतों के साथ मामलों को अदालत में पेश करने में नाकाम रहती है तो इसकी जवाबदेही सीधे सरकार पर आती है। पुलिस प्रशासन तंत्र में ऐसी कमजोरी व लापरवाही को यथाशीघ्र दुरुस्त किया जाना चाहिए। देखा जाता है कि कितने ही मामलों में मीडिया ट्रायल के जरिए अपराध को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।
सिर्फ विरोध नहीं, समय पर जांच भी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
अटकलें लगाई जाती हैं, ‘हाइप’ बनाई जाती है, लेकिन इस तरह के तमाम शोरगुल के बीच सिलसिलेवार तरीके से विश्वसनीय व अकाट्य प्रमाण नहीं जुटाए जाते। इस वजह से मामला अदालत में टिक नहीं पाता। दोष सिद्ध नहीं होने से अदालत अभियुक्त को संदेह का लाभ देकर छोड़ देती है। हर मामले की वैज्ञानिक तरीके से जांच संभव हो गई है।
फोरेंसिक जांच, डीएनए की पहचान जैसे तरीकों से अपराध अन्वेषण किया जा सकता है। साइबर विशेषज्ञों की मदद ली जा सकती है। इतना सब होने पर भी पुलिस क्यों विफल हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला व जस्टिस शील नागर की बेंच ने एक विदेशी नागरीक को जमानत आवेदन पर सुनवाई करते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार जमानत याचिकाओं का पुरजोर विरोध तो करती है, लेकिन मुकदमों की सुनवाई शीघ्र पूरी कराने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाती। एक व्यक्ति 4 वर्षों से जेल में बंद है।
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86 सुनवाई, सिर्फ 2 गवाह; न्याय प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
उसका मामला लोअर कोर्ट में 86 बार लिस्ट में आ चुका है, लेकिन उसे 53 बार अदालत में पेश नहीं किया गया। 4 वर्षों में 34 गवाहों में से सिर्फ 2 के बयान दर्ज किए गए, यह आपराधिक मामलों से निपटने का कौन सा तरीका है? मामले का शीघ्र निपटारा न होना न्याय से खिलवाड़ है और इसके लिए पुलिस का ढीलापन जिम्मेदार है।
दोष सिद्ध हुए बगैर वर्षों तक किसी भी व्यक्ति को जेल में रखना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। केवल संदेह की बुनियाद पर किसी व्यक्ति को पकड़ना और फिर लंबे समय तक उसके खिलाफ प्रमाण नहीं जुटा पाना तथा अदालत में उसे पेश करने में कोताही दिखाती है कि सिस्टम काफी कमजोर व दोषपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आपराधिक मामलों में देरी बर्दाश्त नहीं
प्रमाण जुटाने और अपराध सिद्ध करने योग्य मामला तैयार करने में शिथिलता क्यों दिखाई जाती है? कर्तव्य के नाम पर खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए। ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि हर सप्ताह कम से कम 4 गवाहों के बयान दर्ज किए जाए और इस आदेश को रिकार्ड संबंधित अदालत में पेश किया जाए।
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कई अपराधी लंबे समय से जेल में हैं लेकिन मामले आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इस वजह से सुप्रीम कोर्ट को राज्य सरकार को चेतावनी देनी पड़ी कि मामले न लटकाए जाएं वरना जनता के बीच उसे बेनकाब कर दिया जाएगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
