

Supreme Court Slams Maharashtra Government: देश की सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक मामलों में सुनवाई की कछुआ चाल और कैदियों के मानवाधिकारों की अनदेखी को लेकर महाराष्ट्र सरकार की कार्यप्रणाली पर भयंकर नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख लहजे में महाराष्ट्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो अदालत सरकार को सार्वजनिक रूप से बेनकाब करने से पीछे नहीं हटेगी।
यह गंभीर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के माननीय जस्टिस हसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने एक विदेशी नागरिक द्वारा दायर की गई जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार अदालतों में जमानत याचिकाओं का तो पूरी ताकत से विरोध करती है, लेकिन जेल में बंद आरोपियों के मामलों को तार्किक मुकाम तक पहुंचाने और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
खंडपीठ के सामने जब अपहरण और हत्या के एक गंभीर मामले में बंद आरोपी ने अपनी आपबीती रखी, तो अदालत के जज भी स्तब्ध रह गए। आरोपी ने बताया कि वह पिछले 4 वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे है और निचली सत्र अदालत में उसके मामले की सुनवाई की तारीखें पूरे 86 बार लग चुकी हैं।
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बेहद हैरान करने वाली बात यह रही कि इन 86 तारीखों में से पूरे 53 बार जेल प्रशासन और पुलिस विभाग आरोपी को कोर्ट के समक्ष पेश करने में ही विफल रहे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी भी विचाराधीन कैदी को तय तारीखों पर अदालत में पेश न करना महाराष्ट्र सरकार की एक अक्षम्य और बेहद गंभीर संवैधानिक भूल है।
शीर्ष अदालत ने आरोपी के शीघ्र सुनवाई के मौलिक अधिकार का हवाला देते हुए कड़े शब्दों में कहा, "हमें यह देखकर शर्म आती है कि पिछले 4 साल के लंबे समय में अभियोजन पक्ष के 34 गवाहों में से केवल 2 गवाहों के बयान दर्ज किए जा सके हैं।" पीठ ने स्पष्ट किया कि जब राज्य सरकार जमानत का पुरजोर विरोध करती है, तो मुकदमे की सुचारू और तेज कार्यवाही सुनिश्चित करना भी उसी की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है, लेकिन महाराष्ट्र में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।
अदालत ने राज्य के वकीलों के उन दावों को भी नाकाफी बताया जिसमें कहा गया था कि अब हर तारीख पर कैदियों की पेशी सुनिश्चित की जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि राज्य सरकारें मुकदमों की गति बढ़ाने के लिए एक ठोस नीति बनाएं और हर हफ्ते कम से कम 4 गवाहों के बयान अनिवार्य रूप से दर्ज कर उसका पूरा रिकॉर्ड सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें।