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नवभारत विशेष: पाक ने किया सिंधु जल संधि का दुरुपयोग, भारत को चुकानी पड़ी भारी कीमत
- Written By: अंकिता पटेल
India Pakistan Water: 1960 की सिंधु जल संधि में भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों का बंटवारा हुआ। भारत ने पूर्वी नदियों पर अधिकार पाया, जबकि पश्चिमी नदियाँ पाकिस्तान को मिलीं।

सिंधु जल संधि,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Indus Water Treaty 1960: भारत, ऊपरी तटवर्ती क्षेत्र में स्थित होने के नाते, अधिकांश नदियों के उद्म स्थल पर स्थित था, जबकि पाकिस्तान का कृषि प्रधान क्षेत्र भारी सिंचाई वाले पंजाब के मैदान पूर्व से आने वाले निरंतर जल प्रवाह पर अत्यधिक निर्भर थे। भारत को पंजाब और राजस्थान में अपने विकास उद्देश्यों के लिए इस प्रणाली तक पहुंच की आवश्यकता थी। अपनी घरेलू जरूरतों के बावजूद, भारत ने 19 सितंबर 1960 को पाकिस्तान के साथ यह अत्यधिक रियायती जल-बंटवारे का समझौता किया, जो कि विश्व बैंक द्वारा बनाया गया था।
असमानता की वजह से इस समझौते ने न्यायसंगत होने के बजाय पाकिस्तान के लिए अधिक अनुकूल परिणाम सुनिश्चित किए, भारत को सिंधु और चिनाब दोनों नदियों के ऊपरी हिस्सों में नियोजित अपने सभी काम छोड़ने पड़े। परिणामस्वरूप, इन परियोजनाओं से होने वाले फायदे भारत के बजाय पाकिस्तान को मिलने लगे।
भारत को चिनाब नदी से लगभग 6 मिलियन एकड़ फुट पानी मोड़ने के अधिकार का परित्याग करना पड़ा। मेराला (पाकिस्तान) में चिनाब नदी का जल भारतीय उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं होगा। कच्छ में नदी प्रणाली से किसी भी प्रकार के जल विकास की अनुमति नहीं दी जाएगी। इन भारी प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने तुरंत हो सद्भावनापूर्वक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
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इसके ठीक विपरीत, पाकिस्तान ने लगभग 5 वर्षों तक, 22 दिसंबर 1958 तक, औपचारिक स्वीकृति में देरी की। संधि के आवंटन सूत्र के तहत भारत को पूर्वी 3 नदियों सतलुज, ब्यास और रावी पर विशेष अधिकार प्राप्त हुए, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी 3 नदियों सिंधु, चिनाब और झेलम के जल पर अधिकार दिए गए।
भारत को अनुमति दी गई कि वह अपने क्षेत्र में स्थित पश्चिमी नदियों का उपयोग कर सकता है, लेकिन केवल सीमित तौर पर। भारत को आवंटित पूर्वी नदियों में लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) वार्षिक जल प्रवाह है, जबकि पाकिस्तान को आवंटित पश्चिमी नदियों में लगभग 135 मिलियन एकड़-फीट जल प्रवाह है, जिससे कि पाकिस्तान को इस जल प्रणाली का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है। भारत को 20 प्रतिशत हिस्सा मिला, जिसके बदले में उसने कहीं अधिक विशाल पश्चिमी जल प्रणाली पर अपना सारा दावा छोड़ दिया।
भारत ने पानी साझा करने की कीमत चुकाई। भारत ने पीओके में जल संसाधन अवसंरचना के निर्माण के लिए पाकिस्तान को मुआवजे के तौर पर लगभग 62 मिलियन पाउंड (वर्तमान मूल्य में लगभग 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का भुगतान करने पर सहमति जताई।
यह भुगतान एक अनूठी मिसाल है, जिसमें जल प्रणाली के अधिकांश जल को पहले ही त्यागने बाला ऊपरी देश, निचले देश को ऐसा करने के ‘विशेषाधिकार’ के लिए अतिरिक्त भुगतान करता है।
भारत ने पाकिस्तान को उस समझौते को स्वीकार करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की, जो कि जल आवंटन के मूल प्रश्न पर पाकिस्तान के पक्ष में अत्यधिक झुका हुआ था। इस संधि के तहत भारत अपने भूभाग में सीमित सिंचित फसल क्षेत्र (आईसीए) का ही विकास कर सकता है।
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भारत पर इस बात का भी कड़ा प्रतिबंध है कि वह पश्चिमी नदियों पर बने भंडारण (स्टोरेज) सुविधाओं में भी सीमित मात्रा में जल भंडारण कर सकता है। ये प्रतिबंध एकतरफा हैं, ये भारत को अपने क्षेत्र के भीतर संसाधनों के वैध विकास से रोकते हैं। (क्रमशः)
भारत को चुकानी पड़ी भारी कीमत
सिंधु नदी प्रणाली में 6 प्रमुख नदियां शामिल है। सिंधु, धिनाब, झेलम, रावी, व्यास और सतलुज, जो कि भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों से होकर बहती है। यह प्रणाली सिंधु बेसिन में पेयजल, कृषि और बिजली के उत्पादन को बनाए रखती है, जिससे कि सीमा के दोनों ओर करोड़ों लोगों का जीवनयापन होता है। जब 1947 में भारत का विभाजन हुआ, तो सिंधु नदी प्रणाली को भी दो उत्तराधिकारी देशों के बीच विभाजित कर दिया गया।
लेख- पीके सक्सेना, पूर्व भारतीय आयुक्त सिंधु जल के द्वारा
Sindhu water treaty 1960 india pakistan river sharing agreement history analysis
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