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नवभारत निशानेबाज: जूता बनता जी का जंजाल, चप्पल पहन रहो खुशहाल

Shoes Temple Controversy: धर्मस्थलों में जूते उतारना आस्था और सम्मान का प्रतीक है। चाहे मंदिर हो या मस्जिद, यह परंपरा वैश्विक स्तर पर भी अपनाई जाती है और सुरक्षा नियमों में भी इसका महत्व है।

  • Written By: अंकिता पटेल
Updated On: Apr 14, 2026 | 06:50 AM

नवभारत डिजाइन फोटो

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Religious Customs Shoes Removal Debate: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, सभी जानते हैं कि मंदिर और रसोईघर में जूता पहनकर जाना वर्जित है परंतु जम्मू-कश्मीर में एक मंदिर के इंचार्ज आईएएस अधिकारी ने मंदिर के परिसर में भेंटवस्तुओं की एक दुकान के वास्तु पूजन के समय जूता उतारने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। अपनी 11 वर्ष की सेवा के बावजूद वह भारतीय संस्कृति व परंपरा को नहीं समझ पाया। आखिर उसे बाहर ही रुकना पड़ा’

हमने कहा, ‘किसी भी धर्मस्थल में प्रवेश के पहले जूता-चप्पल-सैडिल बाहर ही उतार देना पड़ता है। वर्ल्ड बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष पॉल बुल्फविट्ज को 2007 में तथा ब्रिटेन के किंग चार्ल्स को 2023 में मस्जिद में प्रवेश के समय बाहर जूते उतारने पड़े थे। तब चार्ल्स के फटे, छेदवाले मोजे नजर आए थे। इंटरनेशनल फ्लाइट से जाते समय एयरपोर्ट अथॉरिटी जूते उतारने को कहते हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी जब अमेरिका जा रहे थे तब एयरपोर्ट पर उन्हें जूते-मोजे उतारने पड़े थे। सुरक्षा प्रोटोकाल के तहत ऐसा होता है।’

हमने कहा, ‘यदि आप किसी कार्यक्रम में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनकर गए तो वहां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलन करने से पहले जूते उतार देने पड़ते हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री जब अमृतसर के स्वर्णमंदिर गए थे तो उन्होंने भी जूते उतार दिए थे। विदेश में किसी ऐतिहासिक स्मारक स्थल, मान्यूमेंट में जाने पर वहां जूते बाहर उतारकर कपड़े के स्लीपर पहन कर भीतर प्रवेश मिलता है।’

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पड़ोसी ने कहा, ‘तब तो ऐसी जगह फीतेवाला जूता पहनकर जाना टालना चाहिए। चप्पल या स्लिपऑन शू झट से बाहर निकालना सुविधाजनक रहता है। जूते से हमें याद आया कि चुनाव के समय पार्टियों में जूतमपैजार होती है। जज को भी सतर्क रहना पड़ता है कि कोई सिरफिरा सख्त सजा सुनाए जाने पर चिढ़कर उनकी और जूता न फेंक दे। सभाओं में उपद्रवी लोग स्टेज पर पुराने जूते-चप्पल फेंकते आए हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कविता लिखी थी इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े बाजार में! एक जमाने में विदेशी कंपनी डॉसन का जूता मशहूर था। तब अकबर इलाहाबादी ने शेर लिखा था- डॉसन ने जूता बनाया, मैंने एक मजमूं लिखा, मेरा मजमूं पिट गया, डॉसन का जूता चल गया।’

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हमने कहा, ‘जो लोग किसी मंदिर में दर्शन करने जाते हैं, उनका ध्यान भगवान पर नहीं, बाहर उतारे अपने कीमती जुत्तों पर लगा रहता है।’

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Religion culture shoes removal temple mosque protocol india global

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Published On: Apr 14, 2026 | 06:50 AM

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