
भारत की जन चेतना का उद्घोष 'वंदे मातरम (सौ. सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: वंदेमातरम – वास्तव में भारत की जन चेतना का उद्घोष। स्वतंत्रता की आत्मा का जयघोष, भाषा, प्रांत, धर्म की सीमाओं से परे राष्ट्र की आत्मा का गीत है। विचार करें हमने ईश्वर को नहीं देखा पर मां को तो सबने देखा है, जैसी मां वैसी ही मातृभूमि। मादर-ए-वतन यानी राष्ट्रमाता। इस वंदेमातरम शब्द में उर्जा का अणु-नाद है और है बिजली की कौंध। एक स्वर गूंजा अद्भुत बलिदानी क्रांतिकारी, बंगाल की मातंगिनी हाजरा के मुख से। बंगाल की इस वीरांगना को जब अंग्रेजों की गोली लगी तब मातंगिनी हाजरा ने प्राण त्यागते हुए इस मंत्र का जयघोष किया। इसके बाद 1885 से लेकर 1947 तक कितने ही स्वाधीनता के दीवानों ने इसे ही दोहराते हुए जेल की दीवारों और फांसी के फंदों को चूमा।
अंग्रेजों के लिए ये शब्द भय, विद्रोह, दबाव और भारत की चेतना और साहस का प्रतीक बन गए थे। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक एक ही मंत्र था, वंदेमातरम। मात्र 6 अक्षर, दो शब्द। ये शब्द नहीं थे, शोले थे, जिनकी तेज आंच से अंग्रेज सरकार की हिम्मत टूट जाती, उसकी उम्मीद झुलस जाती। दूसरी तरफ राष्ट्र की स्वाधीनता की आकांक्षा और शक्ति पनपने लगती, दृढ़ होती जाती। बंकिम बाबू ने लिखा : वंदेमातरम के रचनाकार बंकिमचंद्रन चटर्जी ने 1875 में इस गीत की रचना की, जो ‘बंग दर्शन’ नामक पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ। इसके चार वर्ष बाद सन 1857 के संन्यासी विद्रोह की घटनाओं पर आधारित उपन्यास ‘आनंद मठ’ का प्रकाशन हुआ। इस उपन्यास में बंकिमबाबू ने विद्रोही संन्यासियों के समूह स्वर में इस गीत को गाते हुए बताया। इसके साथ ही बंगाल से लेकर देश के कोने-कोने तक आजादी के लिए जूझने वाले हर बड़े, बूढ़े, बच्चे और नौजवान के लिए ये गीत भारत वंदना के रूप में प्रेरणा का सोपान बना।
कांग्रेस अधिवेशन में गाया जाता रहा 1886 में कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन की शुरुआत इसी गीत के गायन से हुई और एक बार फिर 1896 में कोलकाता के ही विडनस्क्वायर में जो कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, उसमें गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने स्वयं गाकर अधिवेशन की शुरुआत की। वंदेमातरम की इस प्रेरणादायी अपार शक्ति की प्रशंसा में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने कहा था, ‘वंदेमातरम एक सूत्रे बांधिया छी सहस्र ही मन। एक कार्येयें सौपियाछी सहस्र ही जीवन, वंदेमातरम।’ इसके बाद तो हर अधिवेशन में इसे गाए जाने की परंपरा सी हो गई। सन 1901 में फिर से कोलकाता में और सन 1905 में वाराणसी के अधिवेशन में इसे गाया गया। सन 1905 के बंग भंग यानी बंगाल विभाजन के खिलाफ हुए आंदोलन में यह गीत सशक्त हथियार बनकर उभरा। सन 1907 में जब तिरंगे का स्वरूप भिकाजी कामा ने प्रस्तुत किया और इसे जर्मनी में फहराया गया, तब भी राष्ट्रगीत के रूप में इसे गाया गया। आजादी का समय आया।
राष्ट्रध्वज के साथ ही राष्ट्रगीत के चुनाव की बात हुई। तब अपार लोकप्रियता, जागरण की शक्ति, राष्ट्रीय महत्व, अर्थ की व्यापकता के बाद भी सर्व समावेशकता, सर्वधर्मीयता, सर्वजातीयता के भाव के साथ वंदेमातरम के स्थान पर ‘जनगणमन’ को चुना गया। जनगणमन की रचना वंदेमातरम गीत के लिखे जाने के 36 साल बाद यानी 1911 में हुई थी। मातृभूमि के स्वजल, सुफल, शीतल, धनधान्य से पूर्ण शस्यशामल रूप की वंदना करता है। इस गीत से ही प्रेरित होकर महान संगीतकारों ने धुनें बनाई। वंदेमातरम विश्व का एक ऐसा गीत है, जिसकी कई संगीतकारों ने धुनें बनाई। आकाशवाणी से रोज सुबह प्रसारित होता है वंदेमातरम। इसके अलावा यदुनाथ भट्टाचार्य, पं। विष्णु दिगंबर पलुस्कर, पं। ओंकारनाथ ठाकुर, हेमंत कुमार, मा। कृष्णराव, दिलीप कुमार रॉय, एम।एस। सुब्बुलक्ष्मी आदि ने इसे अपने स्वरों से सजाया। इस गीत का अनुवाद करते अरविंद घोष ने लिखा -I bow to the mother। मराठी में ग। दि। माडगूळकर के शब्द हैं वेदमंत्राहून आम्हा वंद्य वंदे मातरम।
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24 जनवरी 1950 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेन्द्र प्रसाद ने कहा ‘वंदेमातरम की लोकप्रियता और आजादी की लड़ाई में उसकी महान भूमिका का सम्मान करते हुए देश, इस गीत को जनगणमन के समान ही, सम्मान का अधिकारी मानता है।’ वंदेमातरम मातृभूमि की आराधना। धना है, शक्ति की उपासना है, मन की चेतना है, बल की धारणा है, विजय की गर्जना है और कोटि कोटि कंठों में निनादित सामर्थ्य की अभिव्यंजना है।
लेख-डॉ. सुनील देवधर के द्वारा






