नवभारत विशेष: बीमारी और काम के बोझ से दबे पुलिसकर्मी, कैसे कर पाएंगे अपराध नियंत्रण ?
Police Workload Crisis: बढ़ते कार्यभार, स्वास्थ्य संकट और संसाधनों की कमी से पुलिस व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। ओवरड्यूटी और तनाव का असर जांच, कानून-व्यवस्था और जनसेवा पर दिखने लगा है।
- Written By: अंकिता पटेल
पुलिस स्वास्थ्य संकट,(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
Police Health Duty Pressure: एक बात पूरे देश में समान तौर पर लागू होती है कि पुलिस पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। जिनके कंधे पर हत्या, चोरी, बलात्कार, छेड़खानी, डकैती, साइबर फ्रॉड, यातायात, लव मैरिज में सुरक्षा, पति-पत्नी के झगड़े में प्रारंभिक जांच, बच्चा चोरी या गुमशुदगी, स्कूलों के बाहर मनचलों से बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी तथा और भी न जाने क्या-क्या है। वह नौकरी बचाने के लिए 180 ब्लड प्रेशर तथा 220 मधुमेह में भी जांच करते हैं तथा अपराधियों को दबोचने के लिए दौड़ लगाते हैं अथवा सुरक्षा करते हैं।
नई भर्तियां, न बीमारी के दौरान 45 डिग्री तापमान में चौराहे पर खड़े होने की ड्यूटी में राहत। उस पर लाइन हाजिर या तबादले पर तबादला। एक जवान या अफसर अगर बीमार या बीमारी की तरफ है तो वह कैसे रात में भागकर चोर को पकड़ पाएगा।
नतीजा यह हो रहा है थानों में केस पेंडिंग बढ़ते जा रहे हैं। ओवर ड्यूटी से वह चिड़चिड़े हो रहे हैं और इससे कारण थानों से मुद्दई को भगा देने के मामले रोज बढ़ रहे हैं। मेडिकल एडवाइजर बताते हैं कि मधुमेह में अप-डाउन चलता रहता है और अगर इंसुलिन ली जाती है, तो स्थिति कब खतरनाक होगी कुछ नहीं कह सकते। यही हाल ब्लड प्रेशर के मरीजों का है।
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आखिर क्या किया जा सकता है इस मामले में? इस पर समाजसेवी और पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं कि जिन भी पुलिस कर्मी की बीमारी डायग्नोस हो उन्हें फील्ड के स्थान पर थानों में या फिर पुलिस के उन कामों में लगाया जाए, जहां पर कम खतरा है या फिर यह संभावना है कि इमरजेंसी में मदद मिल जाएगी। हां, जो जवान सेहतमंद हैं, उन्हें फील्ड में खासकर सीधे जनता से आमने-सामने वाले क्षेत्रों में लगाया जाए, तो थोड़ा मामला सही हो सकता है।
पूरे देश में पुलिसबल में कमी है और जो बल है भी उसका कम से कम दस प्रतिशत तो वीआईपी ड्यूटी में ही व्यस्त रहते हैं। यह बात अलग है कि जब से बाउंसर का चलन आया है, तब से पुलिस कर्मी की मांग थोड़ी कम हुई है पर अभी भी वर्दीधारी पुलिस का साथ रखना एक स्टेट्स बना हुआ है। पुलिस गश्ती दल तथा सायरन लगी त्वरित मददगार गाड़ियां अलग रख दी जाएं, तो भी एक दर्जन से अधिक ऐसे डिजिटल प्लेटफार्म हैं, जहां पर पुलिसकर्मी ही काम करते हैं।
112 एप, किराएदार-नौकर सत्यापन, रोजगार परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए साइबर सेल, संचार साथी, क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क, डिजिटल वॉरियर तथा ई-मालखाना ऐसे हैं, जिन्हें अब जनता समझती है। आखिर तनाव के दौर में बीमार पुलिसकर्मी कैसे अपराध नियंत्रण में पूरी तरह मददगार हो पाएंगे? पुलिस अफसर अपनी उलझनों से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हैं।
वह यह नहीं समझ पाते कि बीमार को मालखाने में ड्यूटी दें या फिर वीआईपी दौरे पर आ रहे किसी नेता की सुरक्षा के लिए गली के मोड़ पर खड़ा करने के लिए अपने मातहतों को कहें? बुलडोजर से माफिया या अपराधी का घर गिराने के लिए नगर निगम के साथ जाने पर पथराव में जब कोई पुलिसकर्मी घायल होता है, तो भी उसे राहत नहीं मिलती।
महिला अपराध में महिला पुलिसकर्मी ही कार्रवाई के लिए जाती है, भले ही उसके साथ कितने ही पुलिसकर्मी क्यों न जाएं। बचे हुए थाने या चौको जाकर खुद देखा जा सकता है कि बाहर भले ही सुंदर-सुंदर वाक्य लिखे हों पर सुविधाएं अभी भी अंग्रेजों के जमाने जैसी हैं।
कैसे कर पाएंगे अपराध नियंत्रण ?
मेडिकल जांच रिपोर्ट को आधार मानें तो देश के 17,000 पुलिस थानों में कार्यरत पुलिस के जवान काम के बोझ के बाद अब बीमारी के बोझ को भी कंधे पर उठाए हुए जनता की सेवा कर रहे हैं। जयपुर में चिकित्सा शिविर लगाकर पुलिस कर्मियों के स्वास्थ्य की जांच हुई।
इसमें करीब 1250 ने अपनी जांच कराई और उसके जो नतीजे थे, उसमें आरंभिक सूचना के आधार पर 20 प्रतिशत जवान या तो देखने में परेशानी महसूस करते हैं या फिर वह ब्लड प्रेशर तथा मधुमेह के शिकार हो गए हैं।
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इसके अतिरिक्त थायरॉयड, प्रोस्टेट, हार्ट, स्टोन जैसी रेगुलर बीमारियों से भी वह परेशान हैं। जब वह ड्यूटी पर होंगे तो पता नहीं कब उनका ब्लड प्रेशर लो हो जाए या मधुमेह शूट कर जाए?
लेख- मनोज वार्षीय के द्वारा
